बस्तर पंडुम 2026 : राष्ट्रपति बोलीं- छत्तीसगढ़ हमेशा घर जैसा लगता है, यहां की संस्कृति प्राचीन और सबसे मीठी

जगदलपुर : लालबाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम 2026 का शुभारंभ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने किया. आदिवासी बहुल बस्तर में राष्ट्रपति की मौजूदगी ने इस आयोजन को केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि आत्मगौरव और पहचान का उत्सव बना दिया. राष्ट्रपति बोलीं द्रौपदी मुर्मू ने कहा छत्तीसगढ़ आना हमेशा मुझे घर जैसा लगता है। यहां की संस्कृति प्राचीन और सबसे मीठी है। बस्तर पडुंम को लोग उत्सव की तरह जीते हैं। यहां की सुंदरता और संस्कृति पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। पिछले 4 दशक से नक्सलवाद के कारण बस्तर के आदिवासियों को नुकसान हुआ। लेकिन अब बस्तर नक्सल मुक्त हो रहा है। बड़ी संख्या में नक्सली हथियार डाल रहे हैं। मुर्मू ने आगे कहा, हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे लोगों का स्वागत करती हूं, जो लोग बरगला रहे हैं उनकी बातों में न आएं।

राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने ये बातें जगदलपुर के लालबाग मैदान में आयोजित बस्तर पंडुम में कही। इस दौरान सीएम ने उन्हें ढोकरा आर्ट से बने कर्मा वृक्ष, कोसा शिल्प से तैयार गमछा भेंट किया। राष्ट्रपति का संबोधन सुनने बस्तर पंडुम कार्यक्रम में कई सरेंडर कर चुके नक्सली भी पहुंचे। छत्तीसगढ़ में एक करोड़ से अधिक के इनामी रहे सरेंडर्ड नक्सली रूपेश ने कहा कि भविष्य को लेकर राष्ट्रपति के विचार सुनने आए थे। दो दिवसीय बस्तर पंडुम में कई जनजातियों के पारंपरिक नृत्य, लोकगीत, वाद्ययंत्र, वेशभूषा और रीति-रिवाजों की आकर्षक प्रस्तुतियां दी जा रही हैं।

इससे पहले राज्यपाल रमेन डेका ने कहा, बस्तर पंडुम 2026 के शुभारंभ मौके पर यहां मौजूद होना मेरे लिए गर्व की बात है। मैं इस भव्य आयोजन के लिए सभी को बधाई देता हूं। हमारे पारंपरिक व्यंजन, कल्चर सभी मिलकर बस्तर की पहचान विश्व स्तर पर दिखाते हैं। यहां के लोग जल जंगल जमीन के बीच रहते हैं। गांव गांव से आए लोग अपनी कला और संस्कृति दिखा रहे हैं। मैं ढोकरा कला का उल्लेख करना चाहूंगा, बस्तर की ढोकरा कला देश विदेश में पसंद की जा रही है। यही हमारी पहचान है। यहां का जनजातीय और समाज हमें प्रकृति का संदेश देती है।

सीएम साय ने कहा कि बस्तर पंडुम केवल एक आयोजन नहीं, बल्कि आदिवासी संस्कृति, परंपराओं और समृद्ध विरासत को समर्पित मंच है, जहां इस बार 12 विधाओं में 54 हजार से अधिक लोगों ने पंजीयन कराया। उन्होंने कहा कि कभी नक्सल भय से पहचाने जाने वाले बस्तर में अब विकास का दौर है और 31 मार्च 2026 तक पूरे बस्तर को नक्सलमुक्त करने का लक्ष्य तय किया गया है, कई गांवों में पहली बार तिरंगा फहरा है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *