स्पेसक्राफ्ट को चांद पर उतरना था, धरती पर बैठे-बैठे कैसे जिंदा जल गए तीन एस्ट्रोनॉट्स?
पहली बार चांद पर उतरने की तैयारी थी. एक डेडलाइन थी. साइंटिस्ट दिन रात काम कर रहे थे. यान का टेस्ट हो रहा था. तीन एस्ट्रोनॉट्स अंदर बंद किए गए. ऑक्सीजन फुल थी. पावर अंदर वाली चालू थी. सारा कुछ चांद जैसा. अचानक एक एस्ट्रोनॉट की सीट के नीचे कुछ हुआ… तीनों एस्ट्रोनॉट्स जिंदा जल गए. अब एक बार फिर जब इंसान धरती पर कदम रखने के लिए बेकरार है तो टेस्ट की भेंट चढ़े उन तीन एस्ट्रोनॉट्स को नहीं भूलना चाहिए, जो अपनी जान देकर भविष्य के मून मिशन की नींव तैयार कर गए. बात उस समय की है जब 1961 में सोवियत संघ (आज के रूस) ने दुनिया का पहला सैटलाइट लॉन्च किया था. यूरी गागरीन स्पेस में जाने वाले पहले इंसान बने. अमेरिका के राष्ट्रपति जॉन केनेडी को यह सब अच्छा नहीं लगा. वह एक्सीलेरेटर तेज कर अमेरिका को आगे ले जाना चाहते थे. उसी साल उन्होंने संसद में घोषणा कर दी कि हम इसी दशक में चांद पर उतरेंगे और वापस धरती पर आएंगे. अपोलो 8 मिशन के बिल एंडर्स एक इंटरव्यू में बताते हैं कि अमेरिकी टेक्नोलॉजी को सुप्रीम कैसे दिखाया जाए, इसको लेकर काफी प्रेशर था. अमेरिकी टैक्सपेयर्स खासतौर से आयोवा के संपन्न किसान चाहते थे कि अमेरिका जीते.
9 साल का वक्त बहुत कम था. कई अमेरिकियों को संदेह था, डर भी कि कैसे होगा? टेस्ट शुरू हुए, फेल भी होने लगे, साइंटिस्ट सीख रहे थे. केनेडी की डेडलाइन से तीन साल पहले जनवरी 1967 तक नासा का प्रोग्राम रफ्तार नहीं पकड़ पाया था. पूरे देश में 4 लाख लोग उस व्हीकल को बनाने के लिए संघर्ष कर रहे थे जो तीन इंसानों को चांद पर ले जाने वाला था.
किसी ने ऐसा कुछ पहले नहीं उड़ाया था. एक ऐसे विशालकाय रॉकेट को तैयार करना था जो एस्ट्रोनॉट्स की स्पेसशिप को धरती की कक्षा से बाहर पहुंचा सके. स्पेसशिप में ही कमांड, सर्विस मॉड्यूल और सबसे मुश्किल लुनार मॉड्यूल को बनाना था. लुनार मॉड्यूल में बैठकर एस्ट्रोनॉट्स चांद की सतह पर उतरने जा रहे थे, जो मदरशिप से निकलकर चांद पर लैंड करता. जैसे-जैसे देरी हो रही थी, साइंटिस्टों पर दबाव बढ़ रहा था. वे सातों दिन 12-12 घंटे की शिफ्ट कर रहे थे. वे बहुत तेज काम करने लगे थे.
एक दिन लॉन्चपैड पर अपोलो-वन कैप्सूल क्रेन से लाया गया. अपोलो कमांड और सर्विस मॉड्यूल का टेस्ट किया जाना था. मिशन के लीडर गस ग्रीसम थे. स्पेस में उड़ने वाले वह दूसरे अमेरिकी थे. जब उन्होंने अपने स्पेसक्राफ्ट की जांच की तो निराश हो गए. साथी एस्ट्रोनॉट जॉन यंग ने उनसे कहा कि खराब वायरिंग की आप शिकायत कीजिए. उन्होंने कहा कि ये देखिए यहां तारों के बंडल हैं. ये इधर-उधर लपेटे गए हैं लेकिन गस ने कहा कि अगर मैं कुछ भी शिकायत करूंगा तो वे मुझे निकाल देंगे. गस को तब समझ में नहीं आया कि उनकी जान खतरे में है. तीनों एस्ट्रोनॉट्स का ग्रुप फोटो लिया गया. 27 जनवरी को गस ग्रीस अपोलो 1 के क्रूमेट्स से मिले. उन दोनों का नाम था- एड वाइट, रोजर चैफी. अब स्पेसक्राफ्ट का टेस्ट करना था. आखिरकार वे अपोलो 1 स्पेसक्राफ्ट के भीतर पहले रियल टेस्ट के लिए दाखिल हुए.
स्पेसक्राफ्ट अपना पावर यूज कर रहा था, अपना फ्यूल इस्तेमाल कर रहा था और ऑक्सीजन भी. एक तरफ से अब यह स्पेसक्राफ्ट उन तीन लोगों के जिम्मे था. फ्लोरिडा के केप कैनेवरल लॉन्चपैड पर एस्ट्रोनॉट्स को सील कर दिया गया. प्योर ऑक्सीजन फुल थी और उतना प्रेशर था जितना स्पेस में होता है. उस समय के मिशन डायरेक्टर और मिशन रूम से देख रहे साइंटिस्टों ने बाद में माना कि किसी को खतरे की उम्मीद नहीं थी. इसी दौरान कम्युनिकेशन टूट गया.
गस ग्रीसम ने झल्लाते हुए कहा कि अगर हम तीन बिल्डिंग्स के बीच बात नहीं कर पा रहे हैं तो चांद पर कैसे जा रहे हैं? जीसस क्राइस्ट. वे अंदर इंतजार करते रहे कि वर्कर्स जल्द ही रेडियो ठीक कर देंगे तभी बड़ा हादसा हो गया. ग्रीसम की सीट के नीचे एक तार में स्पार्क हुआ और आग लग गई. ऑक्सीजन से भरा यान अंदर ही अंदर जलने लगा. उस समय शाम के 6.31 बजे थे. शुक्रवार का दिन था. बाकी साइंटिस्ट कैमरा मॉनिटर में आग की लपटें देख रहे थे. कुछ ही देर में धमाका हो गया. तीनों एस्ट्रोनॉट्स की मौत हो गई.
