Crude Oil की कीमतों में आग.. 112 डॉलर के बाद अब $150 पहुंचने की भविष्यवाणी.. डरा रहे हैं ये संकेत

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतों में लगी ‘आग’ बुझने का नाम नहीं ले रही है। ब्रेंट क्रूड देखते ही देखते $112 प्रति बैरल के स्तर को पार कर गया है, जिसने पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्थाओं के लिए खतरे की घंटी बजा दी है। पश्चिम एशिया (West Asia) में बढ़ते तनाव और ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ में सप्लाई बाधित होने जैसे संकेतों ने विशेषज्ञों को डरा दिया है, जो अब कच्चे तेल के $150 तक पहुंचने की भविष्यवाणी कर रहे हैं। बाजार में मची इस अफरा-तफरी के पीछे कई बड़े और गंभीर कारण हैं। इस समय पश्चिम एशिया (West Asia) यानी मिडिल ईस्ट में चल रहा भारी तनाव आग में घी डालने का काम कर रहा है। इसके अलावा, दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्ते ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज’ (Strait of Hormuz) में सप्लाई बाधित होने से पूरी दुनिया की तेल आपूर्ति चेन टूट गई है। एक तरफ बड़े तेल उत्पादक देश (OPEC+) जानबूझकर उत्पादन में कटौती कर रहे हैं, तो दूसरी तरफ पूरी दुनिया में ऊर्जा की मांग तेजी से बढ़ रही है। मांग और सप्लाई के बीच बढ़ता यह अंतर ही कीमतों को $150 के डरावने स्तर की ओर धकेल रहा है।

ब्रेंट क्रूड में केवल एक दिन में 4.17% का भारी उछाल आया है, जिससे इसकी कीमत $111.86 प्रति बैरल पर पहुंच गई है। चौंकाने वाली बात यह है कि पिछले एक महीने में ही तेल की कीमतों में करीब 55.95% की भयंकर बढ़त दर्ज की गई है। अमेरिकी बेंचमार्क (WTI Crude) भी पीछे नहीं है, वह भी $100 के मनोवैज्ञानिक स्तर को छूने के बेहद करीब है। एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर मिडिल ईस्ट का संकट नहीं थमा, तो $150 का नया रिकॉर्ड बनना अब नामुमकिन नहीं लगता।

निवेशकों में डर का माहौल है, जिसका असर भारतीय बाजार पर भी दिख रहा है। गिफ्ट निफ्टी (Gift Nifty) में आज 2.45% की बड़ी गिरावट देखी गई है, जो दलाल स्ट्रीट के लिए खतरे की घंटी है। अमेरिकी बाजार (Dow Jones) और जापानी बाजार (Nikkei) भी लाल निशान में गोता लगा रहे हैं। जब तेल महंगा होता है, तो कंपनियों की लागत बढ़ जाती है और उनका मुनाफा कम हो जाता है, यही वजह है कि शेयर बाजार में इस समय हाहाकार मचा हुआ है।

भारत जैसे देश के लिए कच्चा तेल $112 के पार जाना एक बड़ी चुनौती है। भारत अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल बाहर से खरीदता है। अगर कीमतें $150 तक जाती हैं, तो डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होगा, जिससे आयात (Import) और महंगा हो जाएगा। इसका सीधा मतलब है कि आने वाले दिनों में आपकी ईएमआई (EMI) से लेकर घर के बजट तक, सब कुछ बिगड़ सकता है। अब पूरी दुनिया की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या तेल उत्पादक देश सप्लाई बढ़ाएंगे या फिर दुनिया को इस नई महंगाई की लहर के साथ जीना होगा।