अमित जोगी ‘जग्गी हत्याकांड’ का मास्टरमाइंड, हाईकोर्ट ने माना- आकाश चैनल के डायरेक्टर ने शूटर को 5 लाख दिए

छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की डिवीजन बेंच ने हाईप्रोफाइल राम अवतार जग्गी हत्याकांड में 23 साल बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी को दोषी करार देते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई है। डिवीजन बेंच ने अमित जोगी को क्लीन चिट देने वाले CBI स्पेशल कोर्ट के फैसले को गलत और हास्यास्पद बताते हुए उसे खारिज कर दिया। साथ ही हाईकोर्ट ने अमित जोगी को इस मामले का मास्टरमाइंड भी बताया है। बताया गया है कि आकाश चैनल के डायरेक्टर ने राम अवतार जग्गी पर गोली चलाने के लिए शूटर को 5 लाख रुपए दिए थे। दरअसल छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी को मुख्यमंत्री बनाने के हाईकमान के फैसले को विद्याचरण शुक्ल ने कभी स्वीकार नहीं किया। इसके चलते उनके और अजीत जोगी के बीच गहरी खाई बन गई, जो धीरे-धीरे टकराव से बगावत में बदल गई।

इसके बाद विद्याचरण शुक्ल ने कांग्रेस छोड़ दी और नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) में शामिल हो गए। उन्होंने अपने साथ पार्टी के कई मजबूत नेताओं को भी जोड़ा, जिनमें रामावतार जग्गी भी शामिल थे। जग्गी कोई साधारण कारोबारी नहीं थे। 2003 में प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने वाला था। लिहाजा विद्याचरण शुक्ल और उनके बेहद करीबी रामवतार जग्गी को पार्टी के कोषाध्यक्ष की जिम्मेदारी दी। चुनाव से पहले रायपुर समेत अलग-अलग जिलों में पार्टी की राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी।

रैलियों के जरिए एनसीपी ने प्रदेश भर में माहौल बनाना शुरू कर दिया। इस दौरान राज्य सरकार और सत्ताधारी दल के तमाम कोशिशों के बाद भी विद्याचरण और राम अवतार ने रायपुर में रैली निकालकर चुनावी शंखनाद किया। इसी बीच 4 जून 2003 को रायपुर के मौदहापारा थाना क्षेत्र में राम अवतार की गोली मारकर हत्या कर दी गई।

इस घटना के बाद हमलावर फरार हो गए और पूरे प्रदेश में सनसनी फैल गई। शुरुआती जांच में पुलिस ने इसे लूट से जुड़ा मामला बताया, लेकिन जल्द ही यह केस राजनीतिक रंग लेता गया। जग्गी के परिवार और विपक्ष ने इसे सुनियोजित राजनीतिक हत्या करार देते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री अजीत जोगी के बेटे अमित जोगी पर साजिश रचने का आरोप लगाया। राजनीतिक बवाल और परिजनों की मांग पर राज्य सरकार ने इस हत्याकांड की सीबीआई जांच कराई गई। बता दें कि रामावतार जग्गी की हत्या 4 जून 2003 को हुई थी, तब अजीत जोगी छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री थे। केस की शुरुआती जांच राज्य पुलिस ने की थी।

राज्य में 2003 में विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी (BJP) की जीत के बाद रमन सिंह की सरकार ने इस मामले को सीबीआई को सौंप दिया था। सीबीआई ने अमित जोगी समेत कई अन्य आरोपियों के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया था। हत्याकांड की सीबीआई जांच हुई, जिसके बाद सीबीआई ने अमित जोगी को मास्टरमाइंड बताते हुए 1000 पन्ने का चार्जशीट पेश किया। इसमें आकाश चैनल के तत्कालीन डायरेक्टर रेजिनाल्ड जेरेमिया की गवाही सबसे अहम रही। उन्होंने कोर्ट को बताया कि 21 मई 2003 को रायपुर के होटल ग्रीन पार्क में एक मीटिंग हुई थी। इसमें अमित जोगी ने खुलेआम कहा था कि एनसीपी की रैली को रोकने के लिए जग्गी को खत्म करना होगा। जेरेमिया ने यह भी बताया कि जोगी के कहने पर ही उन्होंने कोलकाता जाकर मुख्य शूटर चिमन सिंह को 5 लाख रुपए पहुंचाए थे।

इस मामले में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट ने 31 मई 2007 को फैसला दिया था, जिसमें आरोपियों को अलग-अलग सजा सुनाई गई थी। जबकि केवल अमित जोगी को बरी कर दिया था। अब हाईकोर्ट ने ट्रॉयल कोर्ट के फैसले को गलत बताया है।

डिवीजन बेंच ने कहा कि यह मानना हास्यास्पद है कि बाकी दोषियों ने अमित जोगी को खुश करने के लिए उनकी जानकारी के बिना इतनी बड़ी वारदात को अंजाम दिया। सीबीआई की चार्जशीट के आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि मुख्य आरोपी चिमन सिंह, अमित जोगी का पुराना परिचित था। जांच में सामने आया कि चिमन को अमित के कहने पर ही रायपुर बुलाया गया था और उसके ठहरने का इंतजाम जोगी के करीबियों ने किया था। चिमन ने अपने कबूलनामे में भी जोगी के निर्देशों का जिक्र किया था। होटल ग्रीन पार्क के मैनेजर और सीएम हाउस के सुरक्षाकर्मियों की गवाही से यह साबित हुआ कि हत्या से पहले और बाद में वहां संदिग्ध बैठकें हुई थी। पैसों का लेन-देन, बत्रा हाउस, होटल ग्रीन पार्क और CM हाउस में आरोपियों की अमित जोगी के साथ बार-बार मीटिंग के सबूत साफ दिखाते हैं कि उसे शुरू से ही सारी एक्टिविटी के बारे में पता था और पूरा जुर्म अमित जोगी के कहने पर ही किया गया था।

ट्रायल कोर्ट ने आरोपी अमित जोगी के मामले को दूसरे साजिश करने वालों से अलग करने का कोई कारण नहीं बताया है। कॉल डिटेल्स से भी पुष्टि हुई कि साजिशकर्ता लगातार एक-दूसरे के संपर्क में थे।

हाईकोर्ट ने कहा कि 2003 के विधानसभा चुनावों से पहले एनसीपी नेता राम अवतार जग्गी, तत्कालीन सरकार के लिए एक राजनीतिक खतरा बन गए थे। उन्हें रास्ते से हटाना ही इस खूनी साजिश का मुख्य उद्देश्य था।