सिगरेट छोड़ना अब होगा आसान? फ्रांस की नई रिसर्च ने बदली तंबाकू की परिभाषा

अक्सर कहा जाता है कि तंबाकू छोड़ना दुनिया के सबसे मुश्किल कामों में से एक है. कई देशों की सरकारें इसके लिए विज्ञापन दिखाती हैं, डराती हैं और टैक्स भी बढ़ा देती हैं, लेकिन सिगरेट और तंबाकू की लत है कि पीछा नहीं छोड़ती. लेकिन क्या हो अगर हम कहें कि सिगरेट के धुएं से होने वाली मौतों को कम करने का एक ‘बीच का रास्ता’ है? हाल ही में फ्रांस के स्वास्थ्य मंत्रालय और वहां की एजेंसी ANSES ने तंबाकू को लेकर अपनी बरसों पुरानी सोच बदल दी है. एक बड़ी साइंटिफिक रिपोर्ट के बाद फ्रांस अब स्मोकलेस टोबैको (जैसे हीटेड प्रोडक्ट्स) को सिगरेट के मुकाबले कम खतरनाक मान रहा है. अब सवाल यह है कि जब ब्रिटेन, जापान और फ्रांस जैसे देश अपनी पॉलिसी बदल रहे हैं, तो क्या भारत को भी अपनी पुरानी पाबंदियों पर फिर से विचार करने की जरूरत है? क्या हार्म रिडक्शन का यह फॉर्मूला भारत में लाखों लोगों की जान बचा सकता है? फ्रांस की सरकारी एजेंसी ANSES ने करीब 2,500 साइंटिफिक रिसर्च की गहराई से जांच की. उसके बाद उन्होंने जो निष्कर्ष निकाले, वे सभी के लिए चौंकाने वाले हैं. रिपोर्ट का मानना है कि स्मोकलेस टोबैको प्रोडक्ट्स पूरी तरह सुरक्षित तो नहीं हैं, लेकिन सिगरेट के मुकाबले इनका खतरा बहुत कम है. जहां सिगरेट जलाने पर जो धुआं निकलता है, उसमें 7,000 से ज्यादा जहरीले केमिकल होते हैं. वहीं, स्मोकलेस प्रोडक्ट्स में तंबाकू जलता नहीं है, इसलिए वे फेफड़ों को नुकसान पहुंचाने वाले जहर से बच जाते हैं.

सिर्फ फ्रांस ही नहीं, कई और देश भी अब ‘हार्म रिडक्शन’ (नुकसान कम करने) की राह पर चल पड़े हैं. जहां ब्रिटेन (UK) अपने यहां ‘स्वैप टू स्टॉप’ प्रोग्राम चला रहा है. जिसमें सरकार खुद स्मोकलेस किट बांट रही है, जिससे लोग सिगरेट छोड़ सकें. अब तक 1.25 लाख लोग इसकी मदद ले चुके हैं. वहीं, जापान में भी सिगरेट छोड़कर इन प्रोडक्ट्स को अपनाने वाले लोगों में से सिर्फ 1% से भी कम लोग वापस सिगरेट की तरफ लौटे हैं. साउथ कोरिया की एक स्टडी कहती है कि इन पर स्विच करना ‘सिगरेट छोड़ने’ जितना ही फायदेमंद साबित हुआ.

नई रिसर्च का सबसे बड़ा आधार यह है कि सिगरेट और स्मोकलेस तंबाकू एक जैसे नहीं हैं. सिगरेट में तंबाकू जलता है और उसी जलने से धुआं बनता है. यही धुआं शरीर के लिए सबसे ज्यादा नुकसानदायक माना जाता है. इसमें हजारों तरह के जहरीले तत्व होते हैं, जो फेफड़ों और दिल पर सीधा असर डालते हैं. वहीं, दूसरी तरफ स्मोकलेस उत्पादों में जलने की प्रक्रिया नहीं होती, इसलिए उनमें यह धुआं नहीं बनता. यही वजह है कि उन्हें सिगरेट से कम नुकसान वाला माना जा रहा है.

यह भी साफ किया जा रहा है कि स्मोकलेस उत्पाद पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं. इनके भी अपने खतरे हैं, खासकर लंबे समय तक इस्तेमाल करने पर. लेकिन वैज्ञानिकों का मानना है कि सिगरेट से होने वाले नुकसान के मुकाबले यह खतरा कम हो सकता है. यही अंतर अब नियम बनाने वालों का ध्यान खींच रहा है.

कई देशों में अब तंबाकू को लेकर सोच में बदलाव दिख रहा है. पहले सिर्फ सख्ती और प्रतिबंध पर जोर था, लेकिन अब कुछ जगहों पर नुकसान कम करने के तरीके अपनाए जा रहे हैं. इसका मकसद यह है कि जो लोग तुरंत तंबाकू छोड़ नहीं पाते, उन्हें कम नुकसान वाले ऑप्शन की तरफ ले जाया जाए.

डॉक्टर और एक्सपर्ट्स मानते हैं कि तंबाकू छोड़ना जितना आसान सुनने में लगता है, उतना होता नहीं है. कई लोग कोशिश करते हैं, लेकिन बार-बार असफल हो जाते हैं. ऐसे में अगर उन्हें धीरे-धीरे कम नुकसान वाले ऑप्शन की तरफ बढ़ाया जाए, तो यह ज्यादा असरदार हो सकता है.

भारत ने तंबाकू के खिलाफ काफी सख्त कदम उठाए हैं. पैकेट पर बड़े चेतावनी चित्र, विज्ञापनों पर रोक और जागरूकता अभियान इसके उदाहरण हैं. इन सबके बावजूद देश में तंबाकू से जुड़ी बीमारियां अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं. ऐसे में यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत को भी तंबाकू उत्पादों को अलग-अलग श्रेणियों में बांटकर देखना चाहिए.

अब कुछ एक्सपर्ट्स मानते हैं कि सभी तंबाकू उत्पादों पर एक जैसा नियम लागू करना सही नहीं हो सकता. उनका कहना है कि जिन उत्पादों से नुकसान कम है, उनके लिए अलग नीति बन सकती है. हालांकि, यह फैसला आसान नहीं है और इसमें कई तरह के पहलुओं को ध्यान में रखना होगा.