एमपी के दो सांसद साउथ में विधानसभा चुनाव हारे

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों में भाजपो को पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में बड़ी जीत मिली है। वहीं, एमपी कोटे से राज्यसभा के दो सांसदों को दक्षिण भारत के चुनावी रण में करारी हार का सामना करना पड़ा है। केंद्र सरकार में मंत्री एल. मुरुगन को तमिलनाडु और जॉर्ज कुरियन को केरलम विधानसभा चुनाव में हार का मुंह देखना पड़ा है। मध्य प्रदेश से राज्यसभा सांसद और केंद्रीय राज्य मंत्री जॉर्ज कुरियन को भाजपा ने केरलम की कांजीरापल्ली सीट से मैदान में उतारा था। ईसाई बहुल इस इलाके में कुरियन से काफी उम्मीदें थीं। हालांकि कुरियन मुख्य मुकाबले से पूरी तरह बाहर नजर आए। वे तीसरे नंबर पर रहे। उन्हें महज 26984 के करीब वोट मिले। केरल में एलडीएफ (LDF) और यूडीएफ (UDF) के बीच हुए सीधे मुकाबले में भाजपा के बड़े चेहरे जॉर्ज कुरियन जमीन नहीं बचा सके।

कांजीरापल्ली विधानसभा चुनाव परिणाम

कांग्रेस के रोनी के. बेबी ने बड़ी जीत दर्ज की है।
विजेता: रोनी के. बेबी (कांग्रेस) – 56646 वोट
दूसरे नंबर पर: डॉ. एन. जयराज (केरल कांग्रेस-एम) – 50874 वोट
तीसरे नंबर पर: जॉर्ज कुरियन (BJP) – 26984 वोट
हार का अंतर: जॉर्ज कुरियन मुख्य विजेता से 29,662 वोटों के बड़े अंतर से हारे।

वर्तमान में केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण और मत्स्य पालन राज्य मंत्री और मध्य प्रदेश से राज्यसभा के सांसद जॉर्ज कुरियन केरल में बीजेपी के सबसे पुराने चेहरों में से एक हैं। वे 1980 के दशक से पार्टी से जुड़े हुए हैं और संगठन में अलग-अलग पदों पर रहे हैं।

कुरियन को केरल में ईसाइयों और भाजपा के बीच एक सेतु (Bridge) माना जाता है। वे राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग के उपाध्यक्ष भी रह चुके हैं। जब मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का गठन हुआ, तो कुरियन बिना सांसद रहे मंत्री बनाए गए थे।

बाद में बीजेपी ने उन्हें मध्य प्रदेश से खाली हुई राज्यसभा सीट (ज्योतिरादित्य सिंधिया के इस्तीफे के बाद) से निर्विरोध निर्वाचित करवाकर संसद भेजा। पार्टी ने उन्हें केरल विधानसभा चुनाव में कांजीरापल्ली से उम्मीदवार बनाया ताकि ईसाई वोटों का ध्रुवीकरण किया जा सके, लेकिन वे तीसरे नंबर पर सिमट गए।

मध्य प्रदेश से एक और राज्य सभा सांसद और केंद्रीय सूचना-प्रसारण राज्य मंत्री एल. मुरुगन तमिलनाडु की अविनाशी (SC) सीट से किस्मत आजमा रहे थे। तमिलनाडु भाजपा का पूर्व अध्यक्ष होने के नाते यह चुनाव उनकी साख का सवाल था।

मुरुगन ने लड़ाई तो लड़ी, लेकिन जीत का स्वाद नहीं चख सके। वे परिणामों में दूसरे नंबर पर रहे। उन्हें 56,200 से ज्यादा वोट मिले, लेकिन विपक्षी उम्मीदवार ने उन्हें बड़े अंतर से हरा दिया। तमिलनाडु में क्षेत्रीय अस्मिता और टीवीके (थलापति विजय की पार्टी) की लहर के आगे मुरुगन का ‘दिल्ली कार्ड’ काम नहीं आया।