हर धार्मिक प्रथा को कोर्ट में चुनौती ठीक नहीं, सबरीमाला केस में सुप्रीम कोर्ट बोला- इससे सैकड़ों केस आएंगे
सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और समाज पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे। यह टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने की, जो अलग-अलग धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय का केस भी शामिल है। सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी 40 साल पुरानी जनहित याचिका (PIL) की वैधता पर सवाल उठाए थे।
जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएगा, तो भारतीय समाज पर असर पड़ेगा, क्योंकि यहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कहा, हर अधिकार पर सवाल उठेंगे-मंदिर खुलने या बंद होने तक के मामले कोर्ट में आएंगे। कोर्ट की यह टिप्पणी दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ी 40 साल पुरानी याचिका पर आई। जस्टिस एमएम सुन्द्रेश ने कहा कि अगर ऐसे विवादों को लगातार अनुमति दी गई, तो हर व्यक्ति हर चीज पर सवाल उठाएगा। इससे धर्म टूट सकते हैं और अदालतों पर भी असर पड़ेगा। सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट में दलील दी कि अगर कोई प्रथा सामाजिक या निजी कारणों से जुड़ी है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए। कोई भी प्रथा अगर मौलिक अधिकारों पर नकारात्मक असर डालती है, तो उसे सीमित किया जा सकता है।
इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह तय करना जरूरी है कि धार्मिक प्रथाओं पर सवाल कहां और कैसे उठाए जाएं। क्या यह समुदाय के भीतर होना चाहिए या राज्य या कोर्ट को दखल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सभ्यता से है, और धर्म इसमें एक स्थायी तत्व है। इसे तोड़ना सही नहीं होगा।
दाऊदी बोहरा समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें 1962 के फैसले को चुनौती दी गई थी। उस फैसले में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 रद्द कर दिया गया था। इस कानून के तहत किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी था।
1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना, समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। इसलिए 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है।
