बिहार में एनडीए को लगा झटका, MLC उपचुनाव में RJD ने JDU को हराया
बिहार में नेतृत्व परिवर्तन और सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद एनडीए को तगड़ा झटका लगा है. विधान परिषद की एक सीट के लिए उपचुनाव हुए, जिसमें जेडीयू प्रत्याशी कन्हैया प्रसाद को मात देने में आरजेडी उम्मीदवार सोनू राय सफल रहे. भोजपुर-बक्सर की एमलसी सीट पर अब आरजेडी का कब्जा हो गया है. भोजपुर-बक्सर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन क्षेत्र की विधान परिषद सीट पर जेडीयू का कब्जा था. इस सीट से जेडीयू के राधाचरण साह एमएलसी थे, जो 2025 के विधानसभा चुनाव में विधायक चुन लिए गए हैं. ऐसे में उन्होंने एमएलसी सीट से इस्तीफा दे दिया था, जिसके चलते उपचुनाव हुए है. विधान परिषद के उपचुनाव में जेडीयू और आरजेडी सहित 6 उम्मीदवार मैदान में किस्मत आजमा रहे थे. सम्राट चौधरी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बिहार में यह पहला चुनाव हुआ है, जिसमें एनडीए के उम्मीदवार को शिकस्त खानी पड़ी है. भोजपुर-बक्सर के स्थानीय निकाय के द्वारा चुनी जाने वाली विधान परिषद सीट पर आरजेडी उम्मीदवार सोनू कुमार राय ने भारी मतों से जीत दर्ज की है. इस तरह जेडीयू को तगड़ा झटका दिया है. आरजेडी के सोनू राय ने करीब 340 मत से एमएलसी उपचुनाव जीता है और जेडीयू के उम्मीदवार कन्हैया को हार का मूंह देखना पड़ा है
बता दें कि इस एलएसी चुनाव उपचुनाव में मतदाताओं (मुखिया, वार्ड सदस्य, बीडीसी आदि) थे, जिन्होंने सत्ताधारी जेडीयू के प्रत्याशी कन्हैया साह के बजाय विपक्षी आरजेडी के सोनू राय के पक्ष में खड़े नजर आए. मुख्य मुकाबला आरजेडी और जेडीयू के बीच ही माना जा रहा था, जिसमें विपक्षी खेमे ने बाजी मार ली.
भोजपुर और बक्सर का क्षेत्र राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय माना जाता है. एनडीए, जो वर्तमान में बिहार की सत्ता में है. बीजेपी के सम्राट चौधरी के सीएम बनने के बाद पहला चुनाव हुआ. 2025 के विधानसभा चुनाव हारने के बाद आरजेडी के लिए एमएलसी का उपचुनाव जीतना किसी संजीवनी से भी कम नहीं है. जेडीयू का हारना एनडीए के लिए एक बड़ा मनोवैज्ञानिक झटका है.
विधान परिषद में आरजेडी अपनी संख्या बढ़ा रही है, जिससे सदन में विपक्ष की आवाज और मजबूत होगी. यह जीत इतनी आसान नहीं थी. इसके पीछे तेजस्वी यादव की ‘साइलेंट प्लानिंग’ और जेडीयू के भीतर की ‘भीतरघात’ की एक लंबी कहानी है. आरजेडी ने जमीन पर बाखूबी तरीके से उतारने में सफल रही.
आरजेडी की एमएलसी के उपचुनाव में मिली जीत की सबसे बड़ी इनसाइड स्टोरी यह है कि तेजस्वी यादव ने इस बार केवल मुस्लिम-यादव समीकरण के भरोसे रहने के बजाय ‘सवर्ण और पिछड़ा’ गठजोड़ पर काम किया. सोनू कुमार राय की उम्मीदवारी ने स्थानीय स्तर पर जातिगत दीवारें तोड़ीं. सोनू राय भूमिहार समाज से आते हैं. तेजस्वी ने संदेश दिया कि आरजेडी अब केवल एक खास वर्ग की पार्टी नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने वाली पार्टी है. आरजेडी ने इस चुनाव में तेजस्वी यादव के नेतृत्व में युवाओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों को साधने की रणनीति अपनाई थी. आरजेडी ने इस बार पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय और उनके अधिकारों के मुद्दे को प्रमुखता से उठाया. महागठबंधन के घटक दलों ने एकजुट किया, जो आरजेडी उम्मीदवार सोनू रायके जीत का आधार बनी. इस जीत के बाद आरजेडी खेमे में जश्न का माहौल है.
एनडीए की हार का एक मुख्य कारण आंतरिक गुटबाजी रही. भोजपुर और बक्सर के इलाकों में बीजेपी और जेडीयू के स्थानीय नेताओं के बीच तालमेल की भारी कमी दिखी. नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री पद से हटने का भी साइड इफेक्ट दिखा, जिसका सीधा लाभ आरजेडी को मिला. एनडीए के कुछ धड़ों ने जेडीयू उम्मीदवार को दिल से स्वीकार नहीं किया. जेडीयू के रणनीतिकार यह मानकर चल रहे थे कि सत्ता में होने के नाते जीत सुनिश्चित है, जबकि आरजेडी के कार्यकर्ता घर-घर जाकर वोट मांग रहे थे. इसके अलावा सोनू राय ने जिस तरह से मशक्कत की है, उसका नतीजा रहा है कि आरजेडी जीतने में सफल रही. तेजस्वी यादव ने खुद कमान संभाल रखी थी. उन्होंने पर्दे के पीछे से उन पंचायत प्रतिनिधियों से सीधा संवाद किया जो पिछले विधानसभा चुनाव में एनडीए के साथ थे
