दुनिया की वो जनजाति, जो चबा जाते हैं मगरमच्छ और दरियाई घोड़े

दुनिया में कई ऐसी जनजातियां हैं, जिनकी लाइफस्टाइल और खान-पान के तरीके लोगों को हैरान कर देते हैं. इनमें कुछ जनजातियों के लोग तो बेहद ही खतरनाक होते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि दुनिया में एक ऐसी जनजाति भी है, जिनके लिए मगरमच्छ और दरियाई घोड़े का शिकार करना उनके शौर्य का प्रतीक है? हम बात कर रहे हैं एल मोलो जनजाति (El Molo tribe) की, जो तुर्काना झील के किनारे बसी हुई है. यह जनजाति केन्या की सबसे छोटी समुदायों में गिनी जाती है, जिसकी आबादी महज 300 से 400 तक सीमित रह गई है. इस जनजाति की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जहां आम इंसान मगरमच्छ या दरियाई घोड़े के नाम से कांप जाता है, वहीं ये लोग इनका शिकार कर अपना पेट भरते हैं.

एल मोलो जनजाति के लोग पारंपरिक रूप से कुशल शिकारी होते हैं. वे तुर्काना झील के किनारे छोटी बस्तियों में रहते हैं. इस समाज में वीरता का पैमाना बहुत अलग है. यहां जो पुरुष जितने अधिक मगरमच्छ और दरियाई घोड़ों का शिकार करता है, उसे समाज में उतना ही सर्वश्रेष्ठ और सम्मानित माना जाता है. उनके लिए यह केवल भोजन का स्रोत नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और गौरव का हिस्सा है. वे इन भारी-भरकम जानवरों को बहुत ही पारंपरिक और साधारण हथियारों जैसे हार्पून (एक प्रकार का भाला) से मार गिराते हैं. शिकार के बाद पूरा गांव मिलकर इसका उत्सव मनाता है और मांस को पकाकर एक-दूसरे को खिलाया जाता है.

तुर्काना झील, जिसे ‘जेड सी’ भी कहा जाता है, इस जनजाति की जीवनरेखा है. प्राचीन समय से ही ये लोग इस झील के जलीय जीवों पर निर्भर रहे हैं. हालांकि, बदलते समय और वन्यजीव संरक्षण कानूनों के कारण इनकी लाइफस्टाइल में बदलाव आया है. केन्याई सरकार ने वन्यजीवों की घटती संख्या को देखते हुए मगरमच्छ और दरियाई घोड़े के शिकार पर कड़ा प्रतिबंध लगा दिया है. अब इस जनजाति को शिकार के बजाय मछलियां पकड़कर अपना जीवन यापन करने की हिदायत दी गई है. एल मोलो लोग अब मुख्य रूप से नाइल पर्च और तिलापिया जैसी मछलियों पर निर्भर हैं, लेकिन फिर भी चोरी-छिपे शिकार की खबरें कभी-कभी सामने आती रहती हैं.

सबसे दुखद तथ्य यह है कि एल मोलो जनजाति के लोग बहुत कम उम्र तक ही जीवित रह पाते हैं. उनकी औसत उम्र (Life Expectancy) मात्र 30 से 45 वर्ष के बीच है. वैज्ञानिकों और मानवविज्ञानी इसके पीछे कई गंभीर कारण बताते हैं. पहला मुख्य कारण उनके भोजन में पोषण की भारी कमी और झील के दूषित पानी का सेवन है. तुर्काना झील का पानी अत्यधिक क्षारीय (Alkaline) है और इसमें फ्लोराइड की मात्रा बहुत ज्यादा है. इस पानी को लगातार पीने से उनके दांत और हड्डियां कमज़ोर हो जाती हैं, जिससे वे कम उम्र में ही बीमारियों की चपेट में आ जाते हैं.

झील के बढ़ते प्रदूषण ने उनकी सेहत को और भी नुकसान पहुंचाया है. भारी धातुओं के संपर्क और केवल मछलियों व मगरमच्छ के मांस पर आधारित डाइट के कारण उनके शरीर में आवश्यक विटामिन्स की कमी हो जाती है. इसके अलावा, उनकी कम जनसंख्या के कारण आपस में ही विवाह की समस्या भी है, जिससे कई आनुवंशिक बीमारियां उनकी अगली पीढ़ी में हस्तांतरित हो रही हैं. वे आधुनिक चिकित्सा सुविधाओं से कोसों दूर हैं, जिससे हैजा और अन्य जलजनित बीमारियां उनके गांवों में अक्सर फैलती रहती हैं.

एल मोलो न केवल शारीरिक रूप से बल्कि सांस्कृतिक रूप से भी विलुप्ति की कगार पर हैं. उनकी अपनी मूल ‘एल मोलो भाषा’ अब लगभग खत्म हो चुकी है. वर्तमान पीढ़ी अब पड़ोसी जनजातियों की भाषा ‘संबुरू’ या ‘तुर्काना’ बोलती है. उनकी पारंपरिक घास की झोपड़ियां और जीवन जीने का तरीका अब धीरे-धीरे आधुनिकता की भेंट चढ़ रहा है. आज एल मोलो जनजाति दुनिया के लिए एक चेतावनी की तरह है कि कैसे प्रदूषण और संसाधनों की कमी एक पूरी बहादुर कौम को खत्म कर सकती है. केन्याई सरकार और कई अंतरराष्ट्रीय संगठन अब उन्हें बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं और साफ पानी मुहैया कराने के प्रयास कर रहे हैं, ताकि दुनिया की इस सबसे बहादुर और अनोखी जनजाति के अस्तित्व को बचाया जा सके.