प्रधानमंत्री-मुख्यमंत्री को जेल! मानसून सत्र में आने वाला है ऐसा विधेयक, 17 जुलाई को JPC से हरी झंडी संभव

प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को जेल का रास्ता दिखाने वाला एक बिल संसद के मानसून सत्र में पेश हो सकता है। बताया जा रहा है कि केंद्र सरकार संसद के आने वाले मानसून सत्र में विवादित संविधान (130वां संशोधन) बिल, 2025 को आगे बढ़ा सकती है। भ्रष्टाचार-रोधी इस बिल की जांच कर रही यह संयुक्त संसदीय समिति (JPC) 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को कुछ बदलावों के साथ अपना सकती है। संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के 17 जुलाई को अपनी रिपोर्ट को मंजूरी देने की उम्मीद है।

रिपोर्ट मंज़ूर होने के बाद, केंद्र सरकार बिल को केंद्रीय कैबिनेट के सामने मंज़ूरी के लिए रखने से पहले पैनल की सिफारिशों पर विचार करेगी। इसके बाद इसे संसद के सत्र में विचार और पास कराने के लिए पेश किया जाएगा। यह सत्र 20 जुलाई से शुरू होने की संभावना है।

गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बीते साल अगस्त में पेश किए गए इस बिल का मकसद पीएम-सीएम या मंत्रियों को उनके पद से हटाना है, जिनमें पांच साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान वाले मामले में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्रियों और अन्य मंत्रियों को गिरफ्तार किया जाता है और लगातार 30 दिनों तक न्यायिक हिरासत में रखा जाता है।

प्रस्तावित कानून के तहत, राष्ट्रपति या राज्यपाल क्रमशः PM या CM की सलाह पर उन्हें हटाने का आदेश दे सकते हैं, या हिरासत के 31वें दिन यह कार्रवाई अपने आप लागू हो सकती है। सूत्रों का कहना है कि JPC बिल के मुख्य प्रावधान को तो बनाए रखेगी, लेकिन इसके गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए सुरक्षा उपायों की सिफारिश भी कर सकती है।

पैनल अपराधों की प्रकृति के बारे में स्पष्टता की सिफारिश भी कर सकता है ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि प्रस्तावित अयोग्यता के प्रावधान केवल गंभीर अपराधों पर ही लागू हों।
पैनल की प्रमुख अपराजिता सारंगी ने कहा कि किसी ने भी बिल के पीछे की मंशा पर सवाल नहीं उठाया है। उन्होंने कहा-इसका मकसद राजनीति को अपराध-मुक्त करना और संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखना है। सारंगी ने जोर देकर कहा कि सभी ने संवैधानिक नैतिकता को बनाए रखने के सरकार के इरादे की सराहना की है।

31 सदस्यों वाले इस पैनल का गठन देरी से हुआ क्योंकि कांग्रेस, SP, DMK और तृणमूल कांग्रेस समेत INDIA ब्लॉक की कई पार्टियों ने सदस्यों को नामित नहीं किया था। गठन के बाद भी पैनल में NDA के बाहर के केवल पांच सदस्य थे। NCP-SP की सुप्रिया सुले, AIMIM के असदुद्दीन ओवैसी, YSRCP के निरंजन रेड्डी, अकाली दल की हरसिमरत कौर बादल और नामित सांसद सुधा मूर्ति।

बादल के इस्तीफे के बाद, 30 सदस्यों वाले पैनल में गैर-NDA सांसदों की संख्या घटकर सिर्फ चार रह गई। सूत्रों का कहना है कि रिपोर्ट मंजूर होने पर विपक्षी सांसदों द्वारा असहमति नोट (dissent notes) सौंपे जाने की उम्मीद है।
NDA सांसदों ने विपक्ष के उस आरोप को खारिज कर दिया कि यह बिल अलोकतांत्रिक और संघीय ढांचे के खिलाफ है, और दोषी ठहराए जाने के बजाय हिरासत के आधार पर चुने हुए सदस्यों को दंडित करके प्राकृतिक न्याय के सिद्धांत का उल्लंघन करता है।

गृह मंत्री अमित शाह ने बिल का पुरजोर बचाव किया है। उन्होंने तर्क दिया है कि PM, CM या मंत्रियों को जेल से अपना कार्यालय चलाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। यह दिल्ली के पूर्व CM अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु में DMK सरकार के मंत्री वी. सेंथिल बालाजी की ओर स्पष्ट इशारा था।
समिति ने प्रतिक्रिया के लिए विपक्षी दलों से संपर्क किया है। CPI के डी. राजा ने बिल के प्रस्तावों को राजनीतिक दुरुपयोग और सत्ता के मनमाने इस्तेमाल के प्रति अत्यधिक संवेदनशील बताया है। उन्होंने आरोप लगाया है कि बिल ऐसी स्थिति पैदा कर सकता है जिससे कार्यकारी अधिकारी अदालतों द्वारा दोषी ठहराए बिना चुनी हुई सरकारों को अस्थिर कर सकें।
ओवैसी जैसे विपक्ष के सदस्यों का तर्क है कि नए आपराधिक कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं जिनके तहत पुलिस 30 दिन से ज्यादा समय के लिए हिरासत की मांग कर सकती है, जिससे असल में पद पर बैठे किसी नेता का पद छिनना तय हो जाता है।