बारिश आते ही क्यों ताश के पत्तों की तरह ढह रहे हैं भारी-भरकम पेड़? चौंका देगी वजह

बारिश की बूंदें जब राहत बनकर बरसती हैं, तो कोई नहीं सोचता कि सड़क किनारे छांव देने वाला पेड़ अचानक किसी की मौत का कारण भी बन सकता है! मानसून की भारी बारिश के बीच बीते एक हफ्ते में तीन जिंदगियां जिनमें एक 11 साल का बच्चा भी शामिल था पेड़ गिरने की वजह से हमेशा के लिए खत्म हो गईं. बीएमसी के आंकड़ों के अनुसार, मात्र एक ही दिन में 142 जगहों पर पेड़ या उनकी शाखाएं टूटकर गिरीं. यह सिर्फ एक प्राकृतिक आपदा नहीं है, बल्कि एक गंभीर चेतावनी है. आखिर क्यों हमारे शहरों के रक्षक कहे जाने वाले ये पेड़ अचानक बारिश हवा आते ही गिरने लगते हैं? क्या इसके पीछे सिर्फ हवा ही कारण है?

मानसून में पेड़ों का उखड़ना एक ऐसी आपदा बनकर उभरा है, जिसे अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है. मुंबई में लगातार जारी बारिश के बीच अब तक पेड़ गिरने की सैकड़ों घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं. इन हादसों में कई गाड़ियां मलबे में तब्दील हो गईं और कई सड़कें जाम हो गईं, जो यह साफ दिखाता है कि खराब मौसम में ये पेड़ कितने खतरनाक बन चुके हैं.

ज्यादातर लोग सोचते हैं कि तेज आंधी के कारण से पेड़ गिरते हैं, लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि असल कहानी कुछ और ही है. स्वस्थ और मजबूत पेड़ सिर्फ हवा के झोंकों से कभी नहीं गिरते. पेड़ असल में तब उखड़ते हैं जब उनकी जड़ें या तने पहले से ही कमजोर हो चुके हों. लगातार होने वाली बारिश से जमीन की मिट्टी पूरी तरह पानी सोख लेती है और दलदल जैसा रूप ले लेती है.
इससे जड़ों पर मिट्टी की पकड़ ढीली हो जाती है. ऐसे में जब तेज हवाएं पेड़ के ऊपरी हिस्से से टकराती हैं, तो कमजोर हो चुकी मिट्टी पेड़ का वजन नहीं संभाल पाती और पूरा का पूरा पेड़ जड़ समेत उखड़ जाता है. ऊंचे पेड़ों के साथ यह खतरा और ज्यादा होता है क्योंकि उनकी लंबाई के कारण जड़ों पर प्रेशर कहीं ज्यादा बढ़ जाता है.

पेड़ों के गिरने के पीछे कई कारण हैं, इनमें एक शहरीकरण भी है. शहरों में कंक्रीट का जाल, बिना प्लानिंग के निर्माण कार्य, सड़कों को चौड़ा करना, केबल और पाइपलाइनों के लिए की जाने वाली खुदाई और फुटपाथों का कंक्रीटीकरण पेड़ों की जड़ों को बुरी तरह डैमेज कर रहा है. फुटपाथों पर कंक्रीट बिछने के कारण मिट्टी तक ऑक्सीजन और पानी नहीं पहुंच पाता, जिससे पेड़ अंदर ही अंदर खोखले और कमजोर हो रहे हैं.

भारत के तेजी से बढ़ते शहर आज पेड़ों के लिए खतरा बन चुके हैं. सड़कों के किनारे लगे पेड़ों को कंक्रीट के छोटे-छोटे गड्ढों में कैद कर दिया गया है, जिससे उनकी जड़ें फैल नहीं पातीं. बिना फैली जड़ों के ये पेड़ भारी तूफानों को झेलने में शक्तिशाली नहीं हो पाते हैं. दूसरी तरफ, क्लाइमेट चेंज के कारण अब कम समय में बहुत भारी बारिश और बेहद तेज हवाएं चलने लगी हैं. जब ये खतरनाक मौसम और पहले से कमजोर हो चुके पेड़ आपस में मिलते हैं, तो तबाही का रिस्क कई गुना बढ़ जाता है.

पेड़ गिरने से न सिर्फ इंसानी जान जाती है, बल्कि ट्रैफिक जाम होता है, बिजली की लाइनें टूटती हैं और इमरजेंसी सर्विस भी प्रभावित होती है. वैज्ञानिकों का कहना है कि इसका उपाय पुराने पेड़ों को काटना नहीं है.

इसके बजाय, शहरों में पेड़ों का साइंटिफिक मैनेजमेंट करना होगा. इसके तहत पेड़ों की नियमित हेल्थ चेकिंग, वैज्ञानिक तरीके से छंटाई, कंस्ट्रक्शन के दौरान जड़ों का बचाव और पेड़ों को बढ़ने के लिए पर्याप्त मिट्टी और जगह देना बेहद जरूरी है.