8 महीने पानी में डूबा रहता है ये शिव मंदिर, साल में सिर्फ 4 महीने होते हैं दर्शन

कृष्णा नदी के बैकवाटर में 8 महीने तक पूरी तरह जलमग्न रहने वाला ऐतिहासिक श्री संगमेश्वर स्वामी मंदिर जलस्तर घटने के बाद दोबारा प्रकट हो गया है. चालुक्य काल का यह मंदिर आंध्र प्रदेश के नांदयाल जिले में स्थित है, जहां पहुँचने के लिए तेलंगाना के सोमशिला तट से नाव का सहारा लेना पड़ता है. मान्यता है कि यहाँ पांडवों ने नीम की लकड़ी का शिवलिंग स्थापित किया था. साल में केवल 4 महीने ही इस अद्भुत मंदिर के दर्शन हो पाते हैं, जिसके लिए अब श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है.

सावन का महीना करीब आने के साथ ही देश में आध्यात्मिक और धार्मिक यात्राओं का दौर शुरू हो चुका है. इसी बीच तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के सीमावर्ती क्षेत्र से एक बेहद अद्भुत और चमत्कारी दृश्य सामने आ रहा है. पिछले करीब आठ महीनों से कृष्णा नदी के बैकवाटर में पूरी तरह जलमग्न ऐतिहासिक श्री संगमेश्वर स्वामी मंदिर का ढांचा पानी का स्तर घटने के साथ ही एक बार फिर धीरे-धीरे पानी से बाहर आ गया है. चालुक्य काल के इस अनोखे और रहस्यमयी मंदिर के पुनः प्रकट होने से शिव भक्तों और पर्यटकों में दर्शन के लिए भारी उत्साह देखा जा रहा है.

इतिहासकारों और धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक, इस अद्भुत मंदिर का निर्माण 7वीं-8वीं शताब्दी में बादामी के चालुक्य शासकों द्वारा करवाया गया था. यह स्थान भौगोलिक और धार्मिक रूप से बेहद विशेष है, क्योंकि यहाँ सात पवित्र नदियों कृष्णा, वेणी, तुंगभद्रा, भीमराथी, मलापहारिणी, संगमेश्वर और भवनसी का महासंगम होता है. इसी महासंगम के कारण इस पावन स्थल को ‘संगमेश्वरम’ कहा जाता है. साल में सिर्फ 3 से 4 महीने ही दर्शन के लिए उपलब्ध होने के कारण यहाँ आने वाले दिनों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटने की उम्मीद है.

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, संगमेश्वर मंदिर का इतिहास महाभारत काल से गहराई से जुड़ा हुआ है. माना जाता है कि अपने अज्ञातवास के दौरान पांडवों ने इस पावन स्थान पर आकर विशेष पूजा-अर्चना की थी. इस दौरान पांचों भाइयों में सबसे बड़े धर्मराज युधिष्ठिर ने यहाँ नीम की लकड़ी के एक विशेष शिवलिंग की स्थापना की थी, जो आज भी मंदिर के गर्भगृह में स्थापित है.

इस मंदिर से जुड़ी सबसे हैरान कर देने वाली बात यह है कि साल के लगभग 8 महीने तक पानी के भीतर पूरी तरह डूबे रहने के बावजूद इस प्राचीन लकड़ी के शिवलिंग और मंदिर की वास्तुकला को कोई नुकसान नहीं पहुँचता है. हर साल जब श्रीशैलम जलाशय का जलस्तर बढ़ता है, तो यह मंदिर पूरी तरह पानी में समा जाता है, लेकिन जब पानी घटता है, तो इसकी दीवारें और नक्काशी वैसी की वैसी ही सुरक्षित बाहर निकलती हैं, जो आज के इंजीनियरों के लिए भी एक बड़ा रहस्य है.

भौगोलिक दृष्टि से देखा जाए तो यह मंदिर आंध्र प्रदेश के नांदयाल जिले की सीमा में आता है, लेकिन तेलंगाना के पर्यटकों और श्रद्धालुओं के लिए यह आस्था और रोमांच का एक बड़ा केंद्र बन चुका है. नागरकुरनूल जिले के प्रसिद्ध पर्यटन स्थल सोमशिला गाँव से इस मंदिर तक पहुँचने का रास्ता बेहद अनूठा है. मंदिर के दर्शन के लिए श्रद्धालुओं को तेलंगाना के सोमशिला तट से स्थानीय नावों (बोट) के ज़रिए कृष्णा नदी को पार करना पड़ता है. नदी के उस पार पहुँचने के बाद, आगे का सफ़र स्थानीय ऑटो के माध्यम से तय कर श्रद्धालु इस पौराणिक मंदिर तक पहुँचते हैं. नदी का पानी कम होते ही तेलंगाना पर्यटन और स्थानीय नाविकों ने सोमशिला से श्रद्धालुओं को मंदिर तक पहुँचाने की सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं.