समंदर की लहरों पर चीन की नई क्रांति! बांस से बना डाला दुनिया का पहला Floating Solar Plant
चीन ने समुद्री ऊर्जा के क्षेत्र में एक ऐसा क्रांतिकारी कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है. आमतौर पर समंदर में तैरते हुए सोलर प्लांट बनाने के लिए लोहे, स्टील और भारी प्लास्टिक के ढांचों का इस्तेमाल किया जाता है. लेकिन चीन ने शैंडोंग प्रांत के यांताई तट पर दुनिया का पहला 100-किलोवाट (kW) क्षमता वाला ऐसा फ्लोटिंग सोलर फार्म उतारे हैं जिसका पूरा ढांचा बांस से बना है. ‘Jilin-2’ नाम का यह अनोखा प्लेटफॉर्म बांस के कंपोजिट ट्यूब्स और पाइप्स की मदद से समंदर में तैर रहा है. यह प्रोजेक्ट न केवल चीन को क्लीन एनर्जी देगा बल्कि समंदर में फैलते प्लास्टिक और लोहे के कचरे को भी काफी हद तक कम करेगा.
यह नया फ्लोटिंग सोलर प्लेटफॉर्म ‘Jilin-2’ चीन के वांगताई में प्रदर्शन बेस पर तैनात किया गया है. इसे Yantai CIMC Raffles Ocean Technology Group द्वारा विकसित किया गया है. कंपनी का दावा है कि पारंपरिक स्टील या हाई-डेंसिटी पॉलीथीन (HDPE) ढांचों की तुलना में यह बांस आधारित डिज़ाइन समुद्री पर्यावरण पर होने वाले बुरे प्रभावों को काफी कम कर देता है. यह सोलर फार्म हाइड्रोजन, अमोनिया और मेथनॉल के उत्पादन के लिए बिजली की सप्लाई करेगा. इससे पहले साल 2023 में चीन ने 10kW का एक छोटा मॉडल ‘Jilin-1’ टेस्ट किया था, जिसकी सफलता के बाद अब 100kW का यह बड़ा प्रोजेक्ट लॉन्च किया गया है.
सबके मन में यही सवाल उठ रहा है कि बांस तो पानी में सड़ जाता है, फिर समंदर की तूफानी लहरों में यह कैसे टिकेगा? दरअसल बीजिंग फॉरेस्ट्री यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने इसके लिए खास ‘सी बैम्बू पाइप्स’ तैयार किए हैं. ये फाइबर-रेनफोर्स्ड वुड-बैम्बू कंपोजिट पाइप हैं जिन्हें खास तकनीक से मॉडिफाई किया गया है. ये पाइप समंदर के खारे पानी, लगातार बनी रहने वाली नमी, तेज नमक की फुहारों और सूरज की हानिकारक अल्ट्रावायलेट (UV) किरणों को आसानी से झेल सकते हैं. यह बांस इतना मजबूत और टिकाऊ है कि भारी सोलर पैनलों का भार आराम से संभाल सकता है.
चीन ने साल 2023 में ही ‘प्लास्टिक को बांस से बदलने’ का एक राष्ट्रीय एक्शन प्लान शुरू किया था. बांस एशिया और अन्य महाद्वीपों में बहुत तेजी से उगने वाली घास की प्रजाति है जो हल्की होने के साथ-साथ बेहद लचीली और मजबूत होती है. चीन अब इसका इस्तेमाल रेगिस्तान में रेत को रोकने से लेकर समंदर में बिजली बनाने तक के लिए कर रहा है. चीन का लक्ष्य साल 2030 तक कार्बन उत्सर्जन के पीक पर पहुंचने और 2060 तक पूरी तरह से कार्बन न्यूट्रल बनने का है. ऐसे में पारंपरिक धातुओं की जगह बांस जैसी रिन्यूएबल सामग्री का इस्तेमाल कार्बन फुटप्रिंट को काफी हद तक कम करता है.
CIMC Raffles का कहना है कि 100kW का यह Jilin-2 प्रोजेक्ट तो बस शुरुआत है. अब उनका अगला कदम मेगावाट (MW) क्षमता वाले बांस आधारित विशालकाय सोलर प्रोजेक्ट्स तैयार करना है. इसके साथ ही वैज्ञानिकों की टीम Jilin-2 की मजबूती, लंबे समय तक टिकने की क्षमता और समुद्री तूफानों में इसके व्यवहार पर लगातार नजर रखेगी. इस डेटा का इस्तेमाल भविष्य में समंदर में बनने वाले बड़े पावर प्लांट्स, समुद्री ऊर्जा द्वीपों और ‘मरीन रैंच’ को मजबूत बनाने में किया जाएगा. चीन का यह कदम वैश्विक स्तर पर ग्रीन मरीन मटीरियल को बढ़ावा देने में एक गेमचेंजर साबित हो सकता है.
