अफ्रीका महाद्वीप 2 हिस्सों में टूट रहा, सोच से बड़ी हो चुकी है धरती के क्रस्ट की दरार

अफ्रीका में जमीन के नीचे एक बड़ी भूगर्भीय हलचल हो रही है, जिसके चलते यह विशाल महाद्वीप को दो हिस्सों में टूट रहा है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि पूर्वी अफ्रीका क्षेत्र में धरती की पपड़ी (Crust) बहुत ज्यादा पतली हो गई है, जो महाद्वीप के टूट की ओर इशारा करती है। इस स्टडी के नतीजे नेचर कम्युनिकेशंस में प्रकाशित हुए थे।
तुर्काना रिफ्ट केन्या और इथियोपिया में लगभग 500 किमी तक फैला हुआ है। यह विशाल पूर्वी अफ्रीकी रिफ्ट प्रणाली का हिस्सा है, जो उत्तर पूर्वी इथियोपिया में अफार डिप्रेशन से लेकर मोजाम्बिक तक फैली हुई है। यह अरब और सोमाली प्लेटों को अलग करती है। इस क्षेत्र में अफ्रीकी और सोमाली प्लेटें 4.7 मिलीमीटर प्रतिवर्ष की दर से धीरे-धीरे एक-दूसरे से दूर जा रही हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, जैसे-जैसे यह अलगाव होता है, जमीन की पपड़ी पर तनाव पड़ता है, जिसके कारण सतह मुड़ जाती है और उसमें दरारें पड़ जाती हैं। हालांकि, सभी दरारें महाद्वीपों को अलग नहीं करती हैं, लेकिन तुर्काना की दरार उसी तरफ बढ़ती दिखाई दे रही है। वैज्ञानिकों ने यहां बहुत ज्यादा पतली क्रस्ट का पता लगाया है।

कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लैमोंड-डोहर्टी अर्थ ऑब्जर्वेटरी के पीएचडी छात्र और स्टडी के प्रमुख लेखकर क्रिश्चियन रोवन ने बताया कि दरार की प्रक्रिया पहले की तुलना में कही अधिक उन्नत है और क्रस्ट पहले से कहीं अधिक पतली है। उन्होंने कहा, पूर्वी अफ्रीका में दरार की प्रक्रिया सोच से कहीं अधिक आगे बढ़ चुकी हैं।

स्टडी के नतीजे बताते हैं कि दरार के केंद्र में पपड़ी (Crust) की मोटाई लगभग 13 किलोमीटर है। वहीं, इससे दूर यह 35 से अधिक हो जाती है। यह नाटकीय अंतर नेकिंग(nechking) की ओर इशारा करता है। नेकिंग एक महत्वपूर्ण टेक्टोनिक चरण का संकेत है, जो बताता है कि धरती की पपड़ी बीच से कैसे खिंचती और पतली होती है।

हालांकि, यह बदलाव बहुत लंबे समय में होते हैं। तुरकाना रिफ्ट लगभग 4.5 करोड़ साल पहले खुलना शुरू हुआ था। शोधकर्ताओं का मानना है कि लगभग 40 लाख साल पहले बड़े पैमाने पर ज्वालामुखी विस्फोट के बाद नेकिंग शुरू हुई। इसका अगला चरण ओशनाइजेशन कहा जाता है- यानी महासागर का बनना। इसके शुरू होने में अभी लाखों साल सककते हैं। उस चरण में दरारों से मैग्मा ऊपर उठेगा और समुद्र तल पर नई जमीन बनाएगा। इस दौरान उत्तर में स्थित हिंद महासागर का पानी वहां भर सकता है।