चांद की सतह पर अमेरिका की ‘न्यूक्लियर’ एंट्री ने बढ़ा दी दुनिया की धड़कनें!

अंतरिक्ष की दुनिया में अपना दबदबा कायम करने के लिए अमेरिका अब बड़ी तैयारी कर रहा है. अभी तक इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने वाला अमेरिका अब न्यूक्लियर पावर को भी स्पेस में पहुंचाने की योजना बना रहा है. व्हाइट हाउस के एक नए आदेश ने पूरी दुनिया की स्पेस एजेंसियों को चौंका दिया है. नासा और रक्षा विभाग को अब 2030 तक चंद्रमा पर न्यूक्लियर रिएक्टर तैनात करने का डेडलाइन दे दिया गया है. ऐसे में लोगों के मन में यह सवाल जरूर आ रहा होगा कि क्या अंतरिक्ष में परणाणु विस्फोट करने की अमेरिका तैयारी कर रहा है?

अंतरिक्ष की दुनिया में अपना दबदबा को और मजबूत बनाने के लिए अमेरिका ने एक बहुत ही बड़ी योजना का खुलासा किया है. व्हाइट हाउस की तरफ से जारी किए गए नए मेमो के मुताबिक अमेरिका अब अंतरिक्ष में न्यूक्लियर पावर को अपना हथियार बनाने जा रहा है. अमेरिकी सरकार ने टारगेट रखा है कि साल 2028 तक स्पेस आर्बिट में और 2030 तक चंद्रमा की सतह पर परमाणु रिएक्टर स्थापित कर दिए जाएंगे. इस पहल की शुरुआत साल 2025 के दिसंबर में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के हस्ताक्षरित कार्यकारी आदेश Ensuring American Space Superiority यानी अमेरिकी अंतरिक्ष श्रेष्ठता सुनिश्चित करने का ही हिस्सा है. ऑफिस ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी पॉलिसी के डायरेक्टर माइकल क्रैट्सियोस ने यह नया मेमो नासा के ऊर्जा विभाग और रक्षा विभाग को इस दिशा में तेजी से काम करने के निर्देश दिए हैं.

इस सवाल का जवाब है नहीं, परमाणु रिएक्टर जो अमेरिका अंतरिक्ष में बनाने की तैयारी कर रहा है, इसका उद्देश्य बिजली पैदा करना है. यह एक मशीन की तरह है जो ऊर्जा निकालती है, जिससे चंद्रमा पर बने बेस, रोवर्स और मशीनों को चलाया जा सके.अभी तक सभी अंतरिक्ष यान मुख्य रूप से सोलर एनर्जी या केमिकल फ्यूल से चलते हैं. लेकिन चंद्रमा के अंधेरे हिस्सों या मंगल जैसे सुदूर ग्रहों पर, जहां धूप ठीक से नहीं पहुंचती है, वहां एनर्जी का संकट होता है. व्हाइट हाउस का मानना है कि चंद्रमा और मंगल पर स्थायी इंसानी बस्तियां बसाने के लिए परमाणु ऊर्जा ही मात्र एक विकल्प है, जो बिना रुके बिजली, गर्मी प्रदान कर सकती.

इस मिशन को समय पर पूरा करने और कम खर्च के लिए अमेरिकी सरकार प्राइवेट कंपनियों के साथ हाथ मिलाएगी. यह कदम अमेरिकी अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है, जहां परमाणु ऊर्जा अब सिर्फ एक कल्पना नहीं बल्कि 2030 तक हकीकत बनने जा रही है.