पद्मश्री अनूप रंजन को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार, राष्ट्रपति ने किया सम्मानित
छत्तीसगढ़ की लोक और आदिवासी संस्कृति को देश-दुनिया के मंच तक पहुंचाने वाले पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। नई दिल्ली में आयोजित समारोह में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने उन्हें यह सम्मान प्रदान किया। पुरस्कार मिलने के बाद पांडेय ने इसे अपनी निजी उपलब्धि के बजाय छत्तीसगढ़ के उन लोक कलाकारों को समर्पित किया, जो पीढ़ियों से गीत, संगीत, नृत्य और परंपराओं को जिंदा रखे हुए हैं। उन्होंने कहा कि राज्य के दूरदराज इलाकों में काम करने वाले कलाकारों की साधना और मेहनत को इस सम्मान के जरिए पहचान मिली है। पांडेय लंबे समय से छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं के दस्तावेजीकरण और संरक्षण से जुड़े हैं।
इस दौरान उन्होंने प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जाकर करीब 2500 लोकगीत, लोकगाथाएं और लोककथाएं जुटाईं। नाचा से जुड़े करीब 150 हास्य कार्यक्रमों का भी संकलन किया। इसके साथ ही उन्होंने 175 पारंपरिक लोकवाद्यों को एकत्र कर उन्हें संरक्षित करने की दिशा में काम किया। इनमें कई ऐसे वाद्य हैं जिनका इस्तेमाल स्थानीय समुदायों और पारंपरिक कलाकारों के बीच ही सीमित रह गया था। छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पांडेय ने 80 लोकवाद्य महंत घासीदास संग्रहालय और संस्कृति विभाग को सौंपे। उनका काम केवल संग्रह करने तक सीमित नहीं रहा। वे कलाकारों के बीच जाकर उनकी प्रस्तुति, वाद्य बनाने की प्रक्रिया, लोकगीतों की पृष्ठभूमि और उनसे जुड़ी परंपराओं को भी समझते रहे। भोपाल के मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय के लिए भी उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों से 200 फूंक से बजाए जाने वाले लोकवाद्य जुटाए। इससे लोक संगीत की उन परंपराओं को सामने लाने में मदद मिली, जो धीरे-धीरे सीमित होती जा रही थीं।
पांडेय के सांस्कृतिक काम का एक बड़ा हिस्सा बस्तर से जुड़ा रहा है। करीब डेढ़ दशक पहले उन्होंने आदिवासी कलाकारों के साथ मिलकर ‘बस्तर बैंड’ की शुरुआत की। इसका मकसद बस्तर के पारंपरिक वाद्यों और संगीत को नए मंच पर लाना था। बैंड में ऐसे लोकवाद्यों का इस्तेमाल किया गया, जिनकी पहचान आम दर्शकों के बीच कम थी। बस्तर बैंड की प्रस्तुतियों के जरिए इन वाद्यों और वहां की संगीत परंपरा को देश के दूसरे हिस्सों तक पहुंचाया गया। इसी पहल के दौरान ‘बंदूक छोड़ो… ढोल पकड़ो’ अभियान भी चलाया गया। इसका संदेश युवाओं को हिंसा से दूर रखते हुए उन्हें कला, संगीत और रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ना था। अभियान में लोकगीत, लोकसंगीत और आदिवासी लोकगाथाओं को माध्यम बनाया गया।
पांडेय और उनकी टीम की कोशिशों से 100 से ज्यादा कला मंडलियों को फिर सक्रिय किया गया और 5000 से अधिक कलाकारों को इससे जोड़ा गया। बस्तर बैंड के 11 कलाकारों को राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। पांडेय का काम खास तौर पर उन इलाकों में रहा जहां लोक कलाकारों के पास अपनी कला को बड़े मंच तक ले जाने के साधन कम थे। वे कलाकारों की पारंपरिक शैली में बदलाव किए बिना उसे दर्शकों के सामने पेश करने पर जोर देते रहे हैं। इसी वजह से बस्तर के लोकवाद्य और संगीत को अलग पहचान मिली। उनके काम में संग्रहालयों के लिए सामग्री जुटाने के साथ-साथ कलाकारों को मंच देना भी शामिल रहा है। लोक संस्कृति के संरक्षण को लेकर वे लंबे समय से दस्तावेजीकरण को जरूरी मानते रहे हैं, क्योंकि मौखिक परंपराओं के खत्म होने के साथ कई गीत, कथाएं और वाद्य भी धीरे-धीरे गायब हो सकते हैं।
लोककला के क्षेत्र में अपने काम के साथ अनूप रंजन पांडेय ने अकादमिक स्तर पर भी शोध किया। वर्ष 2015 में उन्होंने इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय, खैरागढ़ से लोक कला में पीएचडी पूरी की। संगीत नाटक अकादमी, नई दिल्ली की जनरल काउंसिल में भी वे करीब 15 साल तक तीन कार्यकालों में सदस्य रहे। इस दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों की लोक और पारंपरिक कलाओं से जुड़े कार्यक्रमों और कलाकारों के साथ काम करने का अवसर उन्हें मिला। वर्तमान में वे ‘चिन्हारी रंगमंडल’ के निर्देशक हैं और बस्तर बैंड से भी जुड़े हुए हैं। उनकी पत्नी अस्मिता पांडेय और बेटी अनन्या पांडेय भी उनकी सांस्कृतिक गतिविधियों में सहयोग करती हैं।
नई दिल्ली के समारोह में राष्ट्रपति ने अलग-अलग राज्यों से आए कलाकारों और कला से जुड़े लोगों को सम्मानित किया। अपने संबोधन में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने भारत की लोक और जनजातीय परंपराओं को देश की सांस्कृतिक विविधता का अहम हिस्सा बताया। उन्होंने कहा कि इन कलाकारों के जरिए भारत की मिट्टी से जुड़ी कहानियां, लोकगीत, नृत्य, त्योहार और क्षेत्रीय बोलियां सामने आती हैं। राष्ट्रपति ने लोककलाओं के संरक्षण के साथ उनके व्यवस्थित दस्तावेजीकरण की जरूरत पर भी जोर दिया। समारोह में सम्मानित कलाकारों में छत्तीसगढ़ से अनूप रंजन पांडेय का नाम राज्य की पारंपरिक कला और संस्कृति के क्षेत्र में उनके लंबे योगदान के लिए प्रमुखता से रहा।
