बहस के दौरान बास्टर्ड शब्द का इस्तेमाल करना अपराध नहीं है या नहीं? सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दी तस्वीर, सुनाया फैसला

सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 294(बी) से जुड़े एक मामले में बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा कि झगड़े के दौरान, बास्टर्ड जैसे शब्द का इस्तेमाल करना अपराध नहीं माना जा सकता. कोर्ट ने साफ किया कि इस तरह के शब्द भले ही अपमानजनक हों, लेकिन हर अपशब्द को कानूनी तौर पर अश्लील नहीं कहा जा सकता. इस फैसले के साथ ही आरोपियों को बड़ी राहत मिली और उनके खिलाफ दी गई सजा को रद्द कर दिया गया. यह मामला मद्रास हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले से जुड़ा था, जिसमें दो आरोपियों को धारा 294(बी) के तहत दोषी ठहराया गया था. आरोप था कि उन्होंने एक बहस के दौरान बास्टर्ड शब्द का इस्तेमाल किया था. हाई कोर्ट ने इसे अश्लील भाषा मानते हुए सजा दी थी. इसके बाद आरोपियों ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी. उनका कहना था कि केवल गाली देने से यह धारा लागू नहीं होती, क्योंकि इसमें अश्लीलता का स्तर अलग होता है.

सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि धारा 294(बी) के तहत अपराध साबित करने के लिए इस्तेमाल किए गए शब्दों में यौन या कामुक तत्व होना जरूरी है. कोर्ट ने कहा कि बास्टर्ड जैसे शब्द किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचा सकते हैं. लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे किसी की कामुक भावनाओं को उत्तेजित करें. इसलिए ऐसे शब्दों को सीधे-सीधे अश्लील नहीं माना जा सकता. इसी आधार पर अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को गलत ठहराया.

यह विवाद एक पारिवारिक संपत्ति को लेकर था, जिसमें बाउंड्री को लेकर झगड़ा हुआ था. इसी दौरान कथित तौर पर आरोपियों ने मृतक के लिए अपशब्दों का इस्तेमाल किया. सरकारी वकील ने तर्क दिया कि यह भाषा अपमानजनक और आपत्तिजनक थी, इसलिए इसे दंडनीय माना जाना चाहिए. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया और कहा कि हर अपमानजनक शब्द को अश्लील नहीं कहा जा सकता. हालांकि, कोर्ट ने अन्य आरोपों में दी गई सजा को बरकरार रखा.

सुप्रीम कोर्ट ने एक पुराने मामले का भी जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि अश्लीलता का मतलब ऐसी चीजों से है जो यौन या कामुक विचारों को बढ़ावा दें. अदालत ने माना कि IPC में अश्लील शब्द की स्पष्ट परिभाषा नहीं दी गई है, लेकिन न्यायालयों ने समय-समय पर इसकी व्याख्या की है. इस केस में इस्तेमाल की गई भाषा उस दायरे में नहीं आती. इस फैसले से यह साफ हो गया है कि कानून गाली-गलौज और अश्लीलता के बीच फर्क करता है.