80 साल से प्रशांत महासागर में डूबे जहाजों से रिस रहा था काला जहर

द्वितीय विश्व युद्ध के समय प्रशांत महासागर में डूबे सैकड़ों युद्धपोत आज भी समुद्र के सीने पर गहरे जख्म की तरह मौजूद हैं. इन जहाजों के जंग लगे स्टील के ढांचे धीरे-धीरे टूट रहे हैं. इनके फ्यूल टैंकों से लगातार जहरीला तेल समुद्र के पानी में रिस रहा है. सामान्य तौर पर पेट्रोलियम से भरा यह कचरा समुद्री जीवों के लिए मौत का सामान माना जाता है. माइक्रोनेशिया के पास समुद्र तल पर पड़े दो जापानी जहाजों के ईंधन की जांच कर रहे वैज्ञानिकों को बिल्कुल अप्रत्याशित नतीजे मिले हैं. वैज्ञानिकों ने पाया कि इस काले और बेहद जहरीले ईंधन के भीतर बैक्टीरिया की एक पूरी दुनिया बस चुकी है. इनमें से कई माइक्रोब्स ऐसे हैं, जो उसी हाइड्रोकार्बन को खाकर जिंदा रहते हैं जो पर्यावरण के लिए सबसे खतरनाक है. यूनिवर्सिटी ऑफ द साउथ पैसिफिक के माइक्रोबायोलॉजिस्ट्स की यह खोज अब आठ दशकों पुराने प्रदूषण से निपटने की नई उम्मीद जगा रही है.

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान प्रशांत महासागर में भयानक नौसैनिक लड़ाइयां लड़ी गई थीं. इस दौरान सैकड़ों जंगी जहाज तबाह होकर समुद्र की गहराइयों में समा गए थे. यह स्टील के विशाल ढांचे पिछले आठ दशकों से शांत और अंधेरे में सड़ रहे हैं.
प्रशांत महासागर के तल पर करीब 330 तेल टैंकर और जंगी जहाज बिखरे पड़े हैं. इनमें से माइक्रोनेशिया का चुउक लैगून सबसे बड़ा कब्रिस्तान माना जाता है. इसे उस दौर में ट्रुक एटोल के नाम से जाना जाता था. यह इलाका दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में जापानी नौसेना का मुख्य अड्डा हुआ करता था.

अमेरिकी वायुसेना ने 1944 में ऑपरेशन हेलस्टोन के तहत इस पूरे बेस को तबाह कर दिया था. इस हमले के बाद दर्जनों जहाज समुद्र में डूब गए थे. आज इस इलाके में करीब 2 लाख टन से ज्यादा डूबे हुए जहाजों का मलबा मौजूद है. जहाजों के गलते हुए टैंकों से दशकों से लगातार तेल बाहर निकल रहा है.

यह रिसाव स्थानीय मछलियों और पूरे मरीन इकोसिस्टम को भारी नुकसान पहुंचा रहा है. पेट्रोलियम हाइड्रोकार्बन पानी में घुलकर टार बॉल्स बना देते हैं, जिससे जलीय जीवन बुरी तरह प्रभावित हो रहा है.
जापानी जहाजों से रिस रहे अलग-अलग तरह के ईंधन में वैज्ञानिकों को क्या मिला?

फिजी की यूनिवर्सिटी ऑफ द साउथ पैसिफिक के शोधकर्ताओं ने इस समस्या की जड़ तक जाने का फैसला किया. उन्होंने चुउक लैगून की गहराई में मौजूद दो मशहूर जापानी जहाजों पर फोकस किया. इनमें पहला जहाज ऑयल टैंकर शिंकोकू मारु था और दूसरा पूर्व पैसेंजर-कार्गो जहाज कियोसुमी मारु था. इन दोनों जहाजों से अलग-अलग तरह का ईंधन समुद्र में रिस रहा था.

शोधकर्ताओं की टीम ने इन दोनों जहाजों के मलबे से ईंधन के सैंपल इकट्ठा किए. इसके अलावा शिंकोकू मारु के तेल और समुद्री पानी के संपर्क वाली सीमा से भी नमूने लिए गए. इन सभी सैंपल्स को गहराई से जांचने के लिए लैब भेजा गया.
वैज्ञानिक मुख्य रूप से दो चीजों की तलाश कर रहे थे. पहला ईंधन की रासायनिक बनावट और दूसरा उसमें रहने वाले बैक्टीरिया.
केमिकल एनालिसिस में पाया गया कि दोनों तरह के ईंधनों में हाइड्रोकार्बन का जटिल मिश्रण था. शिंकोकू मारु के हल्के ईंधन में अधिक एरोमैटिक कंपाउंड्स थे, जबकि कियोसुमी मारु के भारी तेल में लंबे समय तक टिकने वाले हाइड्रोकार्बन मौजूद थे.

लैब में जब इन नमूनों की डीएनए सीक्वेंसिंग की गई, तो वैज्ञानिक हैरान रह गए. इस जहरीले वातावरण में बैक्टीरिया का एक विशाल परिवार फल-फूल रहा था.
रिसर्च टीम ने सैंपल्स में बैक्टीरिया के 42 फाइलम और 1,505 अलग-अलग प्रजातियों के स्तर की पहचान की. इन सभी नमूनों में प्रोटियोबैक्टीरिया का दबदबा सबसे ज्यादा देखने को मिला. इस कम्युनिटी में रालस्टोनिया, स्फिंगोमोनास और कोरीनेबैक्टीरियम जैसे बैक्टीरिया के ग्रुप्स पाए गए.
माइक्रोबायोलॉजी में यह ग्रुप्स हाइड्रोकार्बन को तोड़ने की अपनी क्षमता के लिए जाने जाते हैं. यह बैक्टीरिया पेट्रोलियम के हानिकारक हाइड्रोकार्बन को कार्बन और ऊर्जा के स्रोत के रूप में इस्तेमाल करते हैं. सरल शब्दों में कहें तो यह सूक्ष्म जीव इस जहरीले तेल को अपने भोजन की तरह खाते हैं.
शोधकर्ताओं ने देखा कि शुद्ध तेल और तेल-पानी की सीमा पर मिलने वाले बैक्टीरिया का ढांचा एक-दूसरे से काफी अलग था. इससे यह संकेत मिलता है कि यह सूक्ष्म जीव ईंधन के वातावरण के अनुसार खुद को ढाल रहे हैं.

इस खोज ने मरीन साइंस की दुनिया में हलचल मचा दी है. माइक्रोबायोलॉजिस्ट्स का कहना है कि यह बैक्टीरिया पर्यावरण को साफ करने में गेमचेंजर साबित हो सकते हैं. इस पूरी प्रक्रिया को बायोरेमेडिएशन कहा जाता है. इस तकनीक में सूक्ष्म जीवों की मदद से पर्यावरण में फैले जहरीले कचरे को प्राकृतिक रूप से खत्म किया जाता है.

वैज्ञानिकों का कहना है कि दूसरे विश्व युद्ध के यह जहाज हाइड्रोकार्बन नष्ट करने वाले बैक्टीरिया के प्राकृतिक भंडार बन चुके हैं. हालांकि अभी इस पर आगे और रिसर्च की जरूरत है. वैज्ञानिकों को यह साबित करना होगा कि यह बैक्टीरिया वास्तव में उस तेल को कितनी तेजी से मेटाबोलाइज कर रहे हैं. यह ऐतिहासिक रिसर्च मरीन पोल्यूशन बुलेटिन जर्नल में प्रकाशित हुई है. अगर यह प्रयोग पूरी तरह सफल रहा, तो प्रशांत महासागर में फैले 80 साल पुराने जहरीले प्रदूषण को खत्म करने का एक नया रास्ता खुल जाएगा.