यूरोप में जानलेवा हीटवेव का कहर, टूटे गर्मी के सारे रिकॉर्ड, 40 डिग्री के पार पहुंचा पारा

स्कैंडिनेविया से लेकर आल्प्स तक पूरा यूरोप इस समय भीषण और जानलेवा लू की चपेट में है. पूर्व की ओर बढ़ रही इस हीटवेव के कारण दर्जनों लोगों की मौत हो चुकी है और तापमान 40 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया है, जिससे जर्मनी, डेनमार्क और चेक गणराज्य में गर्मी के रिकॉर्ड पूरी तरह टूट गए. अत्यधिक गर्मी के कारण पैदा हुए स्वास्थ्य संकट को देखते हुए पोलैंड, फ्रांस और इटली जैसे देशों में रेड अलर्ट जारी किया गया है, जबकि रेल पटरियों और सड़कों को होने वाले नुकसान से बचाने के लिए जर्मनी में ट्रेन सेवाएं आंशिक रूप से निलंबित कर दी गई हैं. बर्लिन में पारा 39 डिग्री सेल्सियस तक चढ़ जाने पर स्थानीय पुलिस सड़कों पर लोगों को राहत देने के लिए वॉटर कैनन (पानी की बौछारों) का इस्तेमाल कर रही है.

उधर, वैज्ञानिकों ने इस दमघोंटू लू का मुख्य कारण मानव-निर्मित जलवायु परिवर्तन को बताते हुए आगाह किया है कि इसके चलते रात का तापमान दो दशक पहले की तुलना में 100 गुना अधिक गर्म होने की संभावना बढ़ गई है.

जर्मनी के मौसम विभाग के शुरुआती आंकड़ों के मुताबिक, पूर्वी राज्य सैक्सनी-अनहाल्ट के मोएकर्न-ड्रूविट्ज में तापमान 41.5 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया, जिसने एक दिन पहले सारब्रूकेन में बने 41.3 डिग्री के रिकॉर्ड को तोड़ दिया है. चेक गणराज्य में प्राग के उत्तर में 40.9 डिग्री और डेनमार्क के आरहूस में 37 डिग्री सेल्सियस तापमान दर्ज किया गया जो 1874 के बाद सबसे ज्यादा है.

स्लोवाकिया की राजधानी ब्रातिस्लावा में शुक्रवार को इतिहास की सबसे गर्म रात दर्ज की गई, जबकि स्विट्जरलैंड में भी जून महीने के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त हो गए हैं. जर्मनी की ग्रीन पार्टी की पूर्व संसदीय नेता और संघीय सांसद कैट्रिन गोयरिंग-एकार्ट ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि ये गर्मी कोई सुहावना मौसम नहीं, बल्कि एक गंभीर स्वास्थ्य संकट है.

पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि इंसानों द्वारा किए गए जलवायु परिवर्तन के बिना ऐसी भयानक स्थिति पैदा होना व्यावहारिक रूप से असंभव था. इस खतरनाक मौसमी बदलाव के कारण आल्प्स के पहाड़ी इलाकों में भी रात के समय तापमान 25.4 डिग्री सेल्सियस से नीचे नहीं जा रहा है, जिससे ग्लेशियरों के अस्तित्व पर संकट मंडराने लगा है.