कैसे मिटा डायनासोर का नामोनिशान? उल्कापिंड ने धरती पर मचाया था महाप्रलय

एक समय इस धरती पर डायनासोर का राज था. यह बात इंसानों के आने से लाखों साल पहले की बात है. डायनासोरों की पूरी प्रजाति के समाप्त होने को लेकर कई रिसर्च सामने आती रहती हैं. ऐसा ही एक रिसर्च सामने आया है. अंतरराष्ट्रीय स्तर के रिसर्चर्स की एक टीम ने ‘क्रीटेशियस-पैलियोजीन’ प्रभाव (Cretaceous Paleogene Impact) से बची मिट्टी की पतली परत में मौजूद निकल आइसोटोप का विश्लेषण करने के बाद यह नतीजा निकाला है. वैज्ञानिकों ने उस उल्कापिंड के प्रकार का पता लगा लिया है, जिसने 66 मिलियन यानी 6.6 करोड़ साल पहले धरती से डायनासोर को पूरी तरह खत्म कर दिया था. रिसर्च में पाया गया कि यह एक दुर्लभ CO कॉनड्राइट (CO chondrite) उल्कापिंड था, जो हमारे सौर मंडल के सबसे पुराने और बेहद कम पाए जाने वाले उल्कापिंडों में से एक है.

ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी, पेरिस, ब्रसेल्स और वियना के रिसर्चर्स के नेतृत्व में बनी अंतरराष्ट्रीय टीम ने यह खोज की है. उनके यह नतीजे प्रसिद्ध वैज्ञानिक पत्रिका साइंस एडवांसेज में पब्लिश हुए हैं. यह रिपोर्ट बताती है कि छह करोड़ साठ लाख साल पहले के समय पर धरती पर जीवन के इतिहास के सबसे बड़े सामूहिक विनाश के दौरान उड़ नहीं पाने वाले डायनासोर और अन्य जीव-जंतु विलुप्त हो गए थे. इस विनाश की वजह एक एस्टेरॉयड था.

वैज्ञानिक लंबे समय से जानते हैं कि 10 किलोमीटर चौड़ा एक एस्टेरॉयड पृथ्वी के युकाटन प्रायद्वीप से टकराया था. इस टक्कर से एक विशाल गड्ढा (Chicxulub Crater) बना और धरती की लगभग 75 प्रतिशत प्रजातियां हमेशा के लिए खत्म हो गईं. इनमें सभी गैर-पक्षीय डायनासोर शामिल थे. इस भयंकर प्रभाव से भीषण भूकंप और सुनामी आई. जंगलों में भीषण आग लग गई. वायुमंडल में इतनी भारी मात्रा में धूल और गैस फैल गई कि सूर्य की रोशनी धरती तक पहुंचना बंद हो गई, जिससे ग्लोबल क्लाइमेट पूरी तरह से चरमरा गया.

नई स्टडी में उल्कापिंड की पहचान कार्बनयुक्त CO कॉनड्राइट के रूप में की गई है. यह एक ऐसा उल्कापिंड है जो पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी उल्कापिंडों का केवल 5 प्रतिशत हिस्सा ही बनाता है. रिसर्चर्स का मानना है कि यह संभवतः बृहस्पति ग्रह यानी जूपिटर के पास स्थित बाहरी एस्टेरॉयड बेल्ट या सौर मंडल के बाहरी क्षेत्र के किसी मलबे वाले इलाके से आया था.

यह खोज इस बात पर भी नया प्रकाश डालती है कि यह टक्कर इतनी भयानक क्यों थी. CO कॉनड्राइट में सल्फर की मात्रा काफी कम होती है. इसलिए वैज्ञानिकों का कहना है कि सामूहिक विनाश उल्कापिंड से निकले सल्फर के कारण कम, बल्कि अंतरिक्ष और वायुमंडल में उड़े उस विशाल मलबे के कारण ज्यादा हुआ था जिसने सालों तक सूरज की रोशनी को रोके रखा.

“CO कॉनड्राइट में कार्बन, जिंक, पानी और विशेष रूप से सल्फर जैसे तत्व अन्य उल्कापिंडों की तुलना में बहुत कम होते हैं. यह खोज विनाश की हमारी मूल थ्योरी को बदलती नहीं है लेकिन यह साफ करती है कि उल्कापिंड में मौजूद सल्फर ही तबाही का मुख्य कारण नहीं था. वायुमंडल में उड़ी बारीक धूल और मलबा ही इसका सबसे बड़ा कारण था. शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज दर्शाती है कि वह घटना कितनी असाधारण थी, जब हमारी धरती सौर मंडल के सबसे दुर्लभ उल्कापिंडों में से एक से टकराई थी.