कोरोना से भी खतरनाक बीमारी ने दी दस्तक! इंसानियत का है सबसे पुराना दुश्मन
विज्ञान की भाषा में जिसे हम टीबी (TB) कहते हैं, उसे सदियों पहले सफेद प्लेग के नाम से जाना जाता था. क्योंकि इसके मरीज बेहद पीले और कमजोर पड़ जाते थे. अब न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के 25 से ज्यादा राज्यों में यह बीमारी तेजी से एक बार फिर से पैर पसार रही है. अकेले न्यूयॉर्क शहर में लगभग 1,000 मामले सामने आए हैं. वैज्ञानिकों का दावा है कि लंबे समय तक होने वाली मौतों के मामले में यह बीमारी कोरोना (COVID-19) को भी पीछे छोड़ सकती है. यह वही बीमारी है जिसने 18वीं और 19वीं शताब्दी में यूरोप और अमेरिका की आबादी का एक बड़ा हिस्सा खत्म कर दिया था.
‘व्हाइट प्लेग’ कोई नई बीमारी नहीं है. इसको ही ट्यूबरकुलोसिस (Tuberculosis – TB) या क्षय रोग के नाम से जाना जाता है. पुराने समय में इस बीमारी से पीड़ित व्यक्ति का शरीर खून की कमी और कमजोरी के कारण सफेद या पीला (Pale) पड़ जाता था, इसलिए इसे ‘व्हाइट प्लेग’ कहा जाने लगा. यह हजारों सालों से इंसानों को मार रही है. 18वीं और 19वीं शताब्दी में इसने यूरोप और अमेरिका की एक-चौथाई आबादी को खत्म कर दिया था.
अमेरिका के सेंटर्स फॉर डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन (CDC) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका में टीबी के मामलों में अचानक उछाल देखा गया है. अकेले न्यूयॉर्क में करीब 1,000 मामले दर्ज किए गए हैं, जिसने स्वास्थ्य अधिकारियों को अलर्ट पर डाल दिया है. वैज्ञानिकों का मानना है कि कोविड-19 महामारी के दौरान टीबी की जांच और इलाज में आई कमी के कारण अब इसके मामले ‘विस्फोटक’ तरीके से बढ़ रहे हैं. सबसे बड़ी चिंता मल्टी-ड्रग रेजिस्टेंट टीबी (MDR-TB) की है, जिस पर सामान्य एंटीबायोटिक्स असर नहीं करती हैं.
आज के समय में जब टीबी का इलाज संभव है, तो फिर भी यह क्यों फैल रहा है? इसका सबसे बड़ा कारण वह बैक्टीरिया है जिस पर सामान्य दवाएं असर नहीं कर रही हैं. यह ‘सुपरबग’ की तरह विकसित हो गया है. इसके साथ ही डॉक्टर्स का मानना है कि कोविड-19 के बाद कई लोगों की रोग प्रतिरोधक क्षमता (Immunity) कमजोर हुई है, जिससे दबे हुए टीबी बैक्टीरिया फिर से सक्रिय हो रहे हैं. वहीं, अंतरराष्ट्रीय यात्राओं के कारण संक्रमण एक देश से दूसरे देश में तेजी से फैल रहा है.
टीबी का संक्रमण हवा के जरिए फैलता है. जब कोई संक्रमित व्यक्ति खांसता या छींकता है, तो उसके साथ बैक्टीरिया भी हवा में फैल जाते हैं. आसपास मौजूद लोग आसानी से इसकी चपेट में आ सकते हैं. खास बात यह है कि हर संक्रमित व्यक्ति तुरंत बीमार नहीं दिखता. कई बार यह बीमारी शरीर के अंदर छिपी रहती है और बाद में अचानक सक्रिय हो जाती है.
टीबी के लक्षण धीरे-धीरे सामने आते हैं. जैसे लंबे समय तक खांसी रहना, बुखार, रात में पसीना आना, वजन कम होना और लगातार कमजोरी महसूस होना. अक्सर लोग इसे सामान्य खांसी या थकान समझकर टाल देते हैं, जिससे बीमारी गंभीर हो जाती है.
भारत दुनिया में टीबी के सबसे ज्यादा बोझ वाले देशों में से एक है. अमेरिका जैसे विकसित देश में टीबी का फिर से उभरना एक वैश्विक चेतावनी है. भारत सरकार का लक्ष्य 2025 तक टीबी मुक्त भारत का है, लेकिन वैश्विक स्तर पर बढ़ते मामले इस लक्ष्य के लिए एक नई चुनौती बन सकते हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि टीबी का इलाज संभव है, लेकिन इसमें धैर्य जरूरी है. समय पर पहचान और बिना रुके पूरा इलाज ही इसका एकमात्र समाधान है. मास्क पहनना और स्वच्छता बनाए रखना सिर्फ कोरोना ही नहीं, बल्कि इस ‘व्हाइट प्लेग’ से बचने के लिए भी जरूरी है.
