चांद और मंगल पर होगी खेती! नासा की ‘BLiSS’ तकनीक से अंतरीक्ष की बंजर मिट्टी को बनाया गया उपजाऊ
साइंटिस्ट अंतरिक्ष में बस्तियां बसाने की प्लानिंग बना रहे हैं. इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए साइंटिस्ट ने खास खोज की है, जो मंगल और चंद्रमा की बंजर जमीन पर खेती के रास्ते खोल सकता है. ACS अर्थ एंड स्पेस केमिस्ट्री में छपी एक स्टडी के अनुसार रोसर्चर्स ने जांचा कि क्या वहां की मिट्टी को पौधों के विकास के लिए उपजाऊ बनाया जा सकता है. TAMU के मृदा एवं फसल विज्ञान विभाग के हैरिसन कोकर, जो स्टडी के मुख्य लेखक हैं, उन्होंने बताया, “चांद और मंगल ग्रह पर स्थित चौकियों में उपजाऊ मिट्टी बनाने के लिए जैविक कचरा जरूरी भूमिका निभाएगा.” रिसर्च में सामने आया कि चांद और मंगल से लाई गई मिट्टी को जैविक कचरे के साथ मिलाकर प्रोसेस करने पर सतह के खनिजों से पौधों के लिए जरूरी पोषक तत्व निकाले जा सकते हैं.
कोकर और उनकी नासा की टीम मिलकर यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि रीसायकल किया गया कचरा, चांद और मंगल की नकली मिट्टी के साथ कैसे काम करता है. साइंटिस्ट बायोरीजनेरेटिव लाइफ सपोर्ट सिस्टम (BLiSS) तकनीक पर काम कर रहे हैं, जिसे नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर ने बनाया है. इस तकनीक से इंसानी कचरे को पोषक तत्वों वाले घोल में बदल देती है. फिर इस घोल को मंगल या चांद की मिट्टी में मिलाया जाता है, जिससे वह खेती के लिए उपजाऊ बन जाती है. साइंटिस्ट ने इस पोषक तत्व वाले घोल को सिमुलेटर के साथ मिलाया, जो चांद-मंगल की मिट्टी जैसी होती है. इसके बाद इस मिश्रण को 24 घंटे तक हिलाया गया, जिससे पोषक तत्व अच्छी तरह से मिल जाए.
साइंटिस्ट ने पाया कि इस प्रोसेस से मिट्टी में सल्फर, कैल्शियम और मैग्नीशियम जैसे जरूरी पोषक तत्व पैदा हो गए. माइक्रोस्कोपिक जांच से पता चला कि इस तरीके से चांद-मंगल की नुकीली और खुरदरी मिट्टी भी चिकनी हो गई, जिससे वह धरती की उपजाऊ मिट्टी जैसी दिखने लगी. यह खोज फ्यूचर में मंगल और चांद के मिशनों के लिए बेहद जरूरी है. इंसानी कचरे को रीसायकल करके अंतरिक्ष यात्री वहां खुद का खाना उगा सकेंगे, जिससे उन्हें धरती से मिलने वाली सप्लाई पर निर्भरता कम हो जाएगी.
रिसर्च के नतीजे अच्छे हैं, लेकिन अभी यह केवल शुरुआत है. क्योंकि रिसर्च में अंतरिक्ष की असली मिट्टी के बजाय नकली मिट्टी और कचरे का इस्तेमाल किया गया है. साथ ही अभी केवल मिट्टी के उपजाऊ होने के पुष्टि हुई है, असल में फसल उगाना अभी बाकी है.
