हाईवे तो छोड़िये, यहां आज तक नहीं बन पाई कच्ची सड़क, पहाड़ चढ़कर जाते हैं लोग!

भारत विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ रहा है. चारों तरफ एक्सप्रेसवे, हाईवे और आधुनिक सड़कें बन रही हैं, लेकिन फिर भी देश के एक कोने में ऐसी जगह है जहां आजादी के 78 साल बाद भी ना हाईवे है, ना पक्की सड़क और ना ही कच्ची सड़क है. हम बात कर रहे हैं लद्दाख के जांस्कर क्षेत्र में स्थित विश्व प्रसिद्ध फुगटल मॉनेस्ट्री की. यह मठ एक प्राकृतिक गुफा के अंदर पहाड़ को काटकर बनाया गया है. ऊंची चट्टानों पर लकड़ी और मिट्टी से बना यह परिसर मधुकोष की तरह दिखता है. यहां पहुंचने के लिए पर्यटकों और श्रद्धालुओं को कई किलोमीटर की कठिन ट्रेकिंग करनी पड़ती है. रास्ते में खड़ी चट्टानें, तेज नदी और संकरी पगडंडियां इस यात्रा को और चुनौतीपूर्ण बना देती है.

फुगटल मॉनेस्ट्री की नींव 15वीं शताब्दी में जंगसेम शेराप जंगपो नामक तिब्बती बौद्ध गुरु ने रखी थी. कुछ मान्यताओं के अनुसार यह गुफा 2500 साल पुरानी है, जहां प्राचीन काल में साधु-संन्यासी ध्यान और मोक्ष की तलाश में रहते थे. मठ जेलुग संप्रदाय का हिस्सा है और इसमें प्राचीन पांडुलिपियां, थांगका चित्र और बौद्ध ग्रंथ संरक्षित है. मठ की सबसे खास बात यह है कि यह पूरी तरह एक विशाल गुफा के अंदर बना है. पहाड़ की दीवारों में खुदाई करके कमरे, प्रार्थना कक्ष, रसोई और रहने की जगह बनाई गई है. ऊपर से देखने पर यह मठ चट्टान से चिपका हुआ सा लगता है. सर्दियों में जब पूरा क्षेत्र बर्फ से ढक जाता है तो यहां पहुंचना लगभग असंभव हो जाता है.

निम्मू-पदुम-दारचा रोड बनने के बाद आस-पास के इलाकों में सड़क पहुंच गई है, लेकिन फुगटल मठ तक अभी भी पूरी सड़क नहीं बनी है. पुर्णे गांव तक वाहन पहुंच सकते हैं, उसके बाद ट्रेकिंग अनिवार्य है. कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ब्रिज तक सड़क बन रही है, लेकिन पूरा रास्ता अभी भी पैदल ही तय करना पड़ता है. यहां ना तो मोबाइल नेटवर्क है और ना ही कोई आधुनिक सुविधाएं हैं. बिजली सोलर पैनल से मिलती है. भिक्षु और स्थानीय लोग बेहद सरल जीवन जीते हैं. पानी नदी से लाया जाता है और खाना पारंपरिक तरीके से तैयार किया जाता है. इसीलिए यह जगह उन लोगों के लिए स्वर्ग है जो शोर-शराबे भरी जिंदगी से दूर आध्यात्मिक शांति चाहते हैं.

पुर्णे या चा गांव से शुरू होने वाली ट्रेकिंग Tsarap नदी के किनारे-किनारे जाती है. रास्ते में हरे-भरे मैदान, विशाल चट्टानें और ऊंचे पहाड़ नजारा बिखेरते हैं. बीच-बीच में लकड़ी के पुल भी आते हैं. ट्रेक मध्यम कठिनाई का है लेकिन ऊंचाई के कारण सांस लेना भारी हो सकता है. स्वस्थ लोग 2 से 3 घंटे में मठ तक पहुंच सकते हैं. मठ पहुंचने पर मिलने वाला स्वागत अविस्मरणीय होता है. भिक्षु चाय और भोजन कराते हैं. यहां रुकना भी संभव है. रात में तारों भरा आकाश और पूर्ण सन्नाटा ऐसा लगता है मानो समय थम गया हो.