बंदूक से राखी तक का सफर: पूर्व महिला माओवादियों ने DRG जवानों की कलाई पर बांधा रक्षा सूत्र

बस्तर के जंगलों में कभी जिन हाथों में बंदूकें हुआ करती थीं, उन्हीं हाथों ने जब रक्षाबंधन के मौके पर पुलिस और DRG के जवानों की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधा, तो नारायणपुर में रिश्तों का एक नया अध्याय लिखा गया.

नारायणपुर पुलिस अधीक्षक संदीप कुमार पटेल IPS की पहल पर DRG एरिना भवन में रक्षाबंधन का विशेष कार्यक्रम आयोजित किया गया. कार्यक्रम में आत्मसमर्पित और पुनर्वासित पूर्व महिला माओवादियों ने पुलिस अधिकारियों और DRG जवानों को राखी बांधी. जवानों ने भी इन पूर्व महिला माओवादियों को बहन का सम्मान देते हुए उनकी रक्षा का वचन दिया और उपहार भेंट किए.

एसपी ने कहा कि त्योहार हमेशा शांति का प्रतीक होते हैं. यदि लोग एक साथ मिलकर त्योहार मना रहे हैं, तो यह क्षेत्र में शांति और विश्वास का संदेश देता है. उन्होंने कहा कि आत्मसमर्पित और पुनर्वासित कई महिलाओं ने बताया कि उन्होंने इससे पहले इस तरह रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाया था. अब मुख्यधारा में लौटने के बाद उन्हें सामान्य जीवन जीने और त्योहार मनाने का अवसर मिल रहा है.एसपी ने कहा कि आने वाले समय में भी इसी तरह सभी त्योहार मिल-जुलकर मनाने का उद्देश्य है.

आत्मसमर्पित पूर्व महिला माओवादी फुलमति कश्यप ने बताया कि वह पहले माओवादी संगठन के माड़ डिवीजन की प्रेस टीम की सदस्य के तौर पर कुतुल क्षेत्र में रहती थीं. आत्मसमर्पण के बाद से लगातार विभिन्न त्योहारों में शामिल होने का अवसर मिल रहा है, जबकि पहले इस तरह त्योहार मनाने का मौका नहीं मिला था. वहीं आत्मसमर्पित महिला नक्सली आरती सलाम ने बताया कि जंगल में कभी ऐसा त्यौहार नहीं मनाया.

जवानों ने बताया कि एक समय जंगल में ऑपरेशन के दौरान इन्हीं माओवादी समूहों की ओर से सुरक्षा बलों पर फायरिंग होती थी. परिस्थितियों में जवानों को भी जवाबी कार्रवाई करनी पड़ती थी, लेकिन आज उन्हीं पूर्व महिला माओवादियों को बहन के रूप में सामने देखकर जवानों ने इसे वर्षों के संघर्ष के बाद आए बदलाव का परिणाम बताया.

जवानों के मुताबिक, जंगलों में की गई मेहनत का सबसे बड़ा परिणाम यही है कि जो लोग कभी हथियार लेकर सामने थे, वे आज समाज की मुख्यधारा में लौटकर भाई-बहन के रिश्ते में जुड़ रहे हैं.