GPS को भूल जाइए, अब चलेगा भारत का ‘NavIC’! जानें कैसे काम करता है ISRO का ये स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम

भारत ने अंतरिक्ष की दुनिया में अपनी एक अलग स्वदेशी पहचान बना ली है. हम अब केवल अमेरिकी जीपीएस (GPS) पर निर्भर नहीं हैं, बल्कि हमारे पास अपना खुद का नाविक (NavIC) है. किसी भी संकट के समय यह तकनीक भारत के लिए कितनी ढाल साबित हो सकती है, वैज्ञानिकों ने इसे विस्तार से समझाया है. आज के समय में हम जहां भी जाते हैं, मोबाइल में मैप खोलते हैं और रास्ता मिल जाता है. लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह सुविधा ज्यादातर विदेशी सिस्टम पर टिकी होती है. ऐसे में अगर कभी ये सिस्टम काम करना बंद कर दें, तो बड़ी परेशानी खड़ी हो सकती है. इसी खतरे को देखते हुए भारत ने अपना खुद का नेविगेशन सिस्टम NavIC तैयार किया है. यह तकनीक धीरे-धीरे देश के लिए बेहद अहम बनती जा रही है. इसरो (ISRO) द्वारा बनाया गया NavIC अब स्मार्टफोन्स और कमर्शियल वाहनों में तेजी से अपनी जगह बना रहा है. कारगिल युद्ध के दौरान जब अमेरिका ने भारत को GPS डेटा देने से मना कर दिया था, तभी भारत ने ठान लिया था कि उसका अपना ‘आसमान का पहरेदार’ होगा. आज इसरो (ISRO) का नाविक (NavIC) न केवल तैयार है, बल्कि यह अमेरिकी जीपीएस से भी ज्यादा सटीक और भरोसेमंद साबित हो रहा है.

नाविक (NavIC) का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है. यह भारत का अपना रिजनल सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम (Regional Navigation Satellite System) है. इसमें 7 से 8 सैटेलाइट (Satellites) का एक समूह है, जो पृथ्वी से लगभग 36,000 किलोमीटर ऊपर तैनात हैं. यह न केवल पूरे भारत को कवर करता है, बल्कि देश की सीमाओं से 1500 किलोमीटर बाहर तक की सटीक जानकारी देता है.

अमेरिका का GPS पूरी दुनिया को कवर करता है, लेकिन भारत का NavIC विशेष रूप से भारत और उसके आसपास के 1,500 किलोमीटर के दायरे पर फोकस करता है. GPS जहां आपको 20-30 मीटर तक की एक्यूरेसी देता है, वहीं NavIC भारत के अंदर 5 मीटर से भी कम की एकदम सटीक लोकेशन बता सकता है. NavIC दो फ्रीक्वेंसी बैंड्स (L5 और S-band) का इस्तेमाल करता है. इसका मतलब है कि घने जंगलों, ऊंचे पहाड़ों या बादलों के बीच भी इसका सिग्नल नहीं टूटता. चूंकि NavIC सिर्फ भारत और उसके पड़ोसियों पर केंद्रित है, इसलिए यहां इसके सिग्नल की स्ट्रेंथ ज्यादा मजबूत रहती है. अमेरिका के GPS और भारत के नाविक के काम करने के तरीके में एक बड़ा अंतर है. नाविक के सैटेलाइट भारत के ऊपर एक निश्चित स्थिति में रहते हैं. इससे सिग्नल की निरंतरता बनी रहती है. वहीं, GPS केवल एक बैंड का उपयोग करता है, जबकि नाविक L5 और S-band दोनों का उपयोग करता है. जब सिग्नल वायुमंडल (Ionosphere) से गुजरता है, तो दो बैंड होने की वजह से एरर कम होता है और लोकेशन ज्यादा सही (5-10 मीटर तक) मिलती है.

NavIC बनाने के पीछे सबसे बड़ी वजह सुरक्षा और आत्मनिर्भरता है. अगर कभी युद्ध या किसी बड़े संकट की स्थिति बनती है, तो विदेशी सिस्टम पर निर्भर रहना खतरे से खाली नहीं रहता है. ऐसे समय में अपना खुद का सिस्टम होना बहुत जरूरी हो जाता है, जिससे जरूरी सेवाएं बिना रुके चलती रहें. यही सोचकर ISRO ने इस तकनीक को विकसित किया था.

वैज्ञानिकों के अनुसार, युद्ध या प्राकृतिक आपदा के समय विदेशी नेविगेशन सिस्टम को ब्लॉक किया जा सकता है, लेकिन नाविक पूरी तरह भारत के नियंत्रण में है. मिसाइल गाइडिंग और सीमा पर नजर रखने के लिए यह सेना की ‘तीसरी आंख’ है. मछुआरों को समुद्र में खराब मौसम या अंतरराष्ट्रीय सीमा पार करने पर यह तुरंत अलर्ट भेजता है.

भारत सरकार अब मोबाइल कंपनियों पर जोर दे रही है कि वे अपने नए स्मार्टफोन्स में नाविक सपोर्ट दें. क्वालकॉम (Qualcomm) और एप्पल (Apple) जैसी कंपनियों ने अपने नए चिपसेट में नाविक को शामिल करना शुरू कर दिया है. आने वाले समय में आपके फोन पर ‘GPS’ की जगह ‘NavIC’ का लोगो नजर आ सकता है.

NavIC अभी लगातार बेहतर बनाया जा रहा है. नए सैटेलाइट जोड़े जा रहे हैं और इसकी एक्यूरेसी बढ़ाने पर काम चल रहा है. आने वाले समय में यह सिर्फ भारत ही नहीं, बल्कि आसपास के देशों के लिए भी एक मजबूत नेविगेशन सिस्टम बन सकता है. यह तकनीक भारत को आत्मनिर्भर बनाने के साथ-साथ दुनिया में उसकी ताकत भी दिखाती है.