पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक विवादित बयान…’देश को खतरा कम्युनिज्म से नहीं, हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से है’,
पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी ने एक विवादित बयान दिया है. AG नूरानी मेमोरियल लेक्चर में हामिद अंसारी ने कहा कि जवाहरलाल नेहरू की बात का जिक्र करते हुए कहा कि भारत को खतरा कम्युनिज्म से नहीं बल्कि दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से है. अपने भाषण में अंसारी ने कहा, ‘द RSS: अ मेनेस टू इंडिया (The RSS: A Menace to India) उस किताब का शीर्षक था, जो 2019 में प्रकाशित हुई थी. किताब की प्रस्तावना की पहली पंक्ति में उन्होंने (A.G. नूरानी ने) जो शेर लिखा था, वह आज भारत में मुसलमानों की भावनाओं के बारे में उनके विचारों को बिल्कुल सही ढंग से बयां करता है. इस किताब की प्रस्तावना में, उन्होंने विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक बैठक में जवाहरलाल नेहरू की कही बात का जिक्र किया, जिसे विदेश सचिव गुंडेविया ने भविष्य के लिए दर्ज किया था. मैं उन शब्दों को दोहराता हूं- ‘भारत के लिए खतरा, ध्यान दें, कम्युनिज्म नहीं है, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता है’.
अंसारी ने शुक्रवार को मशहूर संवैधानिक वकील, इतिहासकार अब्दुल गफूर नूरानी को श्रद्धांजलि दी. उन्होंने नूरानी को कई विषयों के जानकार, खुद में एक संस्था और संवैधानिक कानून के सबसे तेज दिमाग वाले लोगों में से एक बताया. एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में अंसारी ने कहा कि नूरानी का जीवन और काम न्याय, नागरिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों के अधिकारों, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक शासन के प्रति उनकी अटूट प्रतिबद्धता को दिखाता है.
अंसारी ने नूरानी की पर्सनैलिटी के कई पहलुओं को याद करते हुए भाषण की शुरुआत की. बॉम्बे (अब मुंबई) में जन्मे और पले-बढ़े नूरानी कच्छी मेमन समुदाय से थे. बॉम्बे और सुप्रीम कोर्ट के वकीलों के बीच अपनी कानूनी काबिलियत के लिए जाने जाते थे. साथ ही, अंसारी ने बताया कि वे एक निजी स्वभाव के शख्स थे, जो अपनी निजी जिंदगी को बहुत संभालकर रखते थे.
उन्होंने बताया कि उनकी गहरी दोस्ती दिल्ली में जामा मस्जिद के पास ‘करीम’ में कई बार जाने से बनी थी. जब भी नूरानी राजधानी आते थे, तो अच्छा खाना उनके कार्यक्रम का एक अहम हिस्सा होता था. अंसारी के भाषण का एक बड़ा हिस्सा मानवाधिकारों और संवैधानिक आजादी की रक्षा में नूरानी के योगदान पर फोकस्ड था. उन्होंने नूरानी को नागरिक आजादी, अल्पसंख्यकों के अधिकारों और संवैधानिक शासन का जबरदस्त समर्थक बताया, खासकर ऐसे समय में जब सरकारी सत्ता और कानून व्यक्तिगत आजादी के लिए गंभीर सवाल खड़े कर रहे थे.
