पति के दबाव में मायके की संपत्ति मांगी तो दहेज का केस बनेगा, कलकत्ता हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
कलकत्ता हाईकोर्ट ने दहेज और सुसाइड के मामले को लेकर अहम फैसला सुनाया है. इस मामले में एक महिला ने अपनी बच्ची की हत्या कर आत्महत्या कर ली थी. पति को इस मामले में आजीवन कारावास हुई थी और उसके माता-पिता को बरी कर दिया गया था. पति को दोषी करार देने के खिलाफ याचिका पर हुई सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा है कि किसी भी महिला को अपनी पैतृक संपत्ति में हिस्सा मांगने कानूनी अधिकार है, लेकिन ये मांग अगर पति के दबाव, मजबूरी या उत्पीड़न में की गई है तो इसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 304 बी के तहत दहेज की मांग माना जाएगा. जस्टिस अरिजीत बनर्जी और अपूर्बा सिन्हा राय की बेंच ने दहेज हत्या मामले में पति की दोषसिद्धि बरकरार रखी और वहीं उसके माता-पिता को साक्ष्य के अभाव में बरी कर दिया.
2 जुलाई के फैसले में कोर्ट ने कहा कि एक महिला पैतृक संपत्ति में अपने हिस्से का दावा करने की कानूनी रूप से हकदार है, लेकिन यदि ये दावा पति के दबाव के कारण किया जाता है तो ये दहेज की मांग के दायरे में आएगा. अगर ये मांग पति के निर्देश और दबाव का परिणाम होती है तो ये नहीं कह सकते की ऐसी मांग दहेज की मांग की व्यापक परिभाषा के बाहर नहीं रखा जा सकता.
ये मामला जून 2014 का एक महिला और उसकी नाबालिग बेटी की मौत से जुड़ा हुआ है. महिला अपने विवाह के चार साल बाद घर में लटकी पाई गई थी. ट्रायल कोर्ट ने पाया कि महिला ने आत्महत्या की थी और बेटी की हत्या के बाद उसने सुसाइड कर लिया था. कोर्ट ने पति और उसके माता-पिता को क्रूरता और दहेज हत्या के लिए दोषी पाया था. पति को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई और सास-ससुर को 7 साल की सजा हुई थी.हाईकोर्ट में पति ने दलील दी कि दहेज की मांग का कोई सबूत नहीं है और महिला ने तो सिर्फ पैतृक संपत्ति में अपना कानूनी हिस्सा मांगा था, लेकिन कोर्ट ने सबूतों के आधार पर पाया कि महिला के भाई ने परिवार की पैतृक संपत्ति का कुछ हिस्सा बेचकर बहन को रुपया दे दिया था. कोर्ट ने पाया कि इसके बाद भी पति लगातार महिला पर दबाव बना रहा था कि वह अपने भाई से शेष बची पैतृक संपत्ति बेचे और उसके हिस्से का राशि उसे सौंपे.
कोर्ट ने कहा कि हालांकि महिला को पैतृक संपत्ति में अपना हिस्सा मांगने का कानूनी अधिकार है, लेकिन सबूतों से ये सिद्ध हुआ है कि इस मामले में पति मायके से धन लाने का लगातार दबाव बना रहा था, इसी कारण महिला ने ये कदम उठाया.
पति ने इस मामले में ये तर्क भी दिया था कि घटना के दो दिन पर दर्ज की गई FIR भी विश्वास करने योग्य नहीं थी क्योंकि शिकायतकर्ता (मृत महिला का भाई) ने इसे दर्ज करने से पहले वकीलों से परामर्श लिया था. इस तर्क को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि एफआई दर्ज करने में देरी से अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर नहीं पड़ता. कोर्ट ने कहा कि जब किसी की बहन और उसके बच्चे की मृत्यु जैसी दुर्भाग्यपूर्ण घटना अचानक घटित होती है तो करीबी स्तब्ध और आवाक रह जाते हैं और वे कई बार निर्णय लेने की स्थिति में नहीं होते. हमारी राय में ऐसी देरी अभियोजन पक्ष के खिलाफ नहीं हो सकती. ऐसी स्थिति में कानूनी सलाह लेना वास्तविक शिकायतकर्ता की ओर से सबसे तर्कसंगत कदम है.
