“बेहद दुर्भाग्यपूर्ण” – सीमांकन जैसे छोटे काम के लिए आम आदमी को हाई कोर्ट आना पड़ रहा है

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट में पहुंचे एक प्रकरण ने राज्य के राजस्व विभाग में व्याप्त भर्राशाही की पोल खोल कर रख दी है। आलम यह है कि यहां सीमांकन जैसे छोटे कम कोबपूरा करने में महीनों नहीं, सालों लगा दिए जाते हैं। हाई कोर्ट ने राजस्व विभाग की इस तरह की कार्यप्रणाली पर कड़ी नाराजगी जताई है। जस्टिस एके प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि नक्शा सुधार, नामांतरण और सीमांकन जैसे छोटे-छोटे कार्यों के लिए भी नागरिकों को विवश होकर हाई कोर्ट आना पड़ रहा है, यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।

कोर्ट ने 8 महीने से लंबित सीमांकन के मामले में तहसीलदार बिलासपुर को 60 दिन के भीतर काम पूरा करने के निर्देश दिए हैं।

ग्राम परसदा निवासी संदीप अग्रवाल की याचिका पर सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट ने राजस्व अफसरों के रवैये पर सवाल उठाए। कोर्ट ने कहा:

1. “नक्शा सुधार, नामांतरण और सीमांकन जैसे राजस्व के छोटे-छोटे प्रकरणों के लिए आम आदमी को हाई कोर्ट में रिट दायर करने पर मजबूर होना पड़ रहा है।”

2. “यह बेहद दुर्भाग्यजनक है। इन मामलों का निराकरण स्थानीय स्तर पर ही हो जाना चाहिए।”

3. कोर्ट ने कहा कि राजस्व अफसर अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा रहे, तभी लोगों को हाई कोर्ट आना पड़ रहा है।

दरअसल संदीप अग्रवाल, निवासी ग्राम परसदा, जिला बिलासपुर ने अपनी जमीन के सीमांकन के लिए 8 दिसंबर 2025 को आवेदन दिया था। खसरा नंबर 388/2 की 1.1420 हेक्टेयर और खसरा नंबर 390/3 की 0.1940 हेक्टेयर भूमि के सीमांकन के लिए आवेदन देने के बावजूद संबंधित राजस्व अधिकारियों ने लंबे समय तक कोई कार्रवाई नहीं की। सीमांकन के कार्य को जानबुझकर लटकाए रखा।

राजस्व दफ्तरों के चक्कर काटकर थक जाने के बाद संदीप अग्रवाल ने अपने अधिवक्ता के माध्यम से हाई कोर्ट में याचिका दायर की। सुनवाई के दौरान राज्य शासन के पैनल लॉयर ने कोर्ट को बताया कि बारिश का मौसम समाप्त होने के बाद बिना किसी देरी के भूमि का सीमांकन करा दिया जाएगा। शासन के इस आश्वासन को रिकॉर्ड पर लेते हुए कोर्ट ने याचिका को निराकृत किया।

हाई कोर्ट ने तहसीलदार, बिलासपुर को आदेश पारित होने की तिथि से 60 दिनों के भीतर याचिकाकर्ता की भूमि का सीमांकन कराने का निर्देश दिया है। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने इस बात पर चिंता जताई कि नागरिकों को मामूली राजस्व मामलों के लिए भी हाई कोर्ट का रुख करना पड़ रहा है। अदालत ने कहा कि नक्शा सुधार, नामांतरण और सीमांकन जैसे कार्यों का समाधान स्थानीय राजस्व स्तर पर ही किया जाना चाहिए।