होर्मुज के बाद अब ट्रम्प की मलक्का स्ट्रेट पर नजर, इंडोनेशिया से रक्षा करार किया

हॉर्मुज स्ट्रेट में इस समय हालात काफी तनाव भरे हैं। अमेरिका वहां ईरान से जुड़े जहाजों की गतिविधियों पर सख्ती कर रहा है। इसी बीच अमेरिका और इंडोनेशिया के बीच 13 अप्रैल को एक नया रक्षा समझौता हुआ है। इस समझौते के तहत अब अमेरिकी सैन्य विमानों को इंडोनेशिया के हवाई क्षेत्र में ज्यादा आसानी से आने-जाने की इजाजत मिल गई है। इसे आधिकारिक तौर पर दोनों देशों के बीच सहयोग बढ़ाने का कदम बताया जा रहा है, लेकिन इसकी टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं। यह डील ऐसे समय हुई है जब US ने ईरान पर दबाव बढ़ाने के लिए होर्मुज में नाकाबंदी शुरू कर दी है। इसके बाद तेल सप्लाई लगभग ठहर गई और कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर पहुंच गई हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि अमेरिका ने मलक्का स्ट्रेट पर नजर रखने के लिए यह करार किया है।

मलक्का स्ट्रेट दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यह वही रास्ता है जो हिंद महासागर को पूर्वी एशिया से जोड़ता है और दुनिया के सबसे व्यस्त समुद्री रास्तों में से एक है। यहां से करीब 40% वैश्विक व्यापार और लगभग 30% तेल सप्लाई गुजरती है। इसकी भौगोलिक स्थिति इसे खास बनाती है। फिलिप चैनल पर इसकी चौड़ाई 3 किलोमीटर है, जो इसे बड़ा बॉटलनेक बनाती है। यह होर्मुज से करीब नौ गुना ज्यादा संकरा है। मलक्का स्ट्रेट पर इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर का कंट्रोल है। इस रास्ते से दुनिया का बहुत बड़ा व्यापार गुजरता है। यही वजह है कि इस इलाके में कोई भी हलचल सीधे तौर पर वैश्विक व्यापार को प्रभावित कर सकती है।

US-इंडोनेशिया डील के बाद एक्सपर्ट्स का मानना है कि अमेरिका इंडो-पैसिफिक में बड़े समुद्री रास्तों को सुरक्षित करने की रणनीति पर काम कर रहा है। अमेरिकी एक्सपर्ट्स और पूर्व सैनिकों ने कहा है कि दुनिया के चोकपॉइंट्स पर US अपनी पकड़ मजबूत कर रहा है। अगर हॉर्मुज को तेल की सप्लाई का मुख्य रास्ता माना जाता है, तो मलक्का को पूरी दुनिया के ट्रेड की लाइफलाइन कहा जा सकता है। यहां से तेल के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनें और बाकी सामान भी बड़ी मात्रा में एक जगह से दूसरी जगह पहुंचते हैं। चीन के लिए तो मलक्का को सबसे बड़ी रणनीतिक कमजोरी माना जाता है। चीन के करीब 80% तेल आयात इसी रास्ते से आते हैं। ये इंडस्ट्रियल इकॉनमी और एक्सपोर्ट सिस्टम के लिए बेहद जरूरी है।

इसी वजह से चीन लंबे समय से इस पर अपनी निर्भरता को एक कमजोरी मानता है। यही कारण है कि पूर्व चीनी राष्ट्रपति हू जिंताओ ने इसे ‘मलक्का डिलेमा’ कहा था। हाल में चीन ने इलाके के आसपास समुद्री मैपिंग और मॉनिटरिंग गतिविधियां बढ़ाई हैं।

मलक्का स्ट्रेट भारत के लिए भी उतना ही अहम है। देश का करीब 55% व्यापार इसी रास्ते और सिंगापुर क्षेत्र से होकर गुजरता है। भारत की भौगोलिक स्थिति उसे इस इलाके में रणनीतिक बढ़त देती है। अंडमान और निकोबार आइलैंड्स इस स्ट्रेट के पश्चिमी मुहाने के पास हैं, जहां से पोर्ट ब्लेयर से 24 घंटे में पहुंचा जा सकता है।

भारत का INS बाज एयर स्टेशन, जो कैंपबेल बे में है, इस इलाके की निगरानी में अहम भूमिका निभाता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, यह भारत को समुद्री ट्रैफिक पर नजर रखने की ताकत देता है।

एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर अमेरिका मलक्का में अपनी भूमिका बढ़ाता है, तो भारत की भागीदारी अहम हो सकती है।

सिंगापुर ने पहली बार मलक्का स्ट्रेट पेट्रोल में भारत की दिलचस्पी को औपचारिक तौर पर माना है। इससे संकेत मिलता है कि क्षेत्रीय सहयोग बढ़ सकता है।

हालांकि, मलक्का स्ट्रेट में अमेरिका के लिए सब कुछ आसान नहीं होगा। इंडोनेशिया और मलेशिया इस इलाके को लेकर काफी संवेदनशील रहते हैं और अपनी संप्रभुता को लेकर कोई समझौता नहीं करना चाहते।