धरती पर अपना ‘सूरज’ क्यों बना रहा भारत? प्रयोग कामयाब रहा तो आम आदमी को क्या होगा फायदा?

चीन को टक्कर देते हुए भारत धरती पर सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की दिशा में काम कर रहा है. इसके लिए वैज्ञानिक ऐसी तकनीक पर काम कर रहे हैं, जो सफल हुई तो आम लोगों को सस्ती और पर्याप्त बिजली मिलने का एक और विकल्प मिल जाएगा. क्या धरती पर सभी देश अपना-अपना सूरज बना सकते हैं? सुनने में यह किसी साइंस फिक्शन फिल्म की कहानी जैसा लगता है, लेकिन चीन से लेकर भारत तक वैज्ञानिक इसी दिशा में काम कर रहे हैं. चीन अपने EAST यानी Experimental Advanced Superconducting Tokamak को ‘आर्टिफिशियल सन’ यानी नकली सूरज कहता है. वहीं अब भारत भी सूरज जैसी ऊर्जा पैदा करने की कोशिश में एक बड़ा कदम आगे बढ़ा रहा है.

गुजरात के गांधीनगर स्थित इंस्टीट्यूट फॉर प्लाज्मा रिसर्च (IPR) में भारत की फ्यूजन रिसर्च मशीन SST-1 के साथ एक नया और ज्यादा शक्तिशाली गायरो ट्रॉन जोड़ा गया है. यह सिस्टम 82.6 गीगाहर्ट्ज की फ्रीक्वेंसी और 400 किलोवाट की क्षमता के साथ काम करता है. इसका मकसद बेहद गर्म प्लाज्मा को गर्म करने और उसे ज्यादा देर तक नियंत्रित रखने की वैज्ञानिक क्षमता बढ़ाना है.

सबसे पहले आपको चीन के बारे में बाते हैं. उसके बाद भारत की ओर आएंगे. चीन का EAST फ्यूजन प्रयोग दुनिया में सबसे ज्यादा चर्चित परियोजनाओं में से एक है. जनवरी 2025 में चीन ने दावा किया था कि EAST ने 10 करोड़ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाले प्लाज्मा को 1,000 सेकंड से ज्यादा समय तक बनाए रखा. यह फ्यूजन रिसर्च के लिए इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल बहुत ज्यादा तापमान पैदा करना काफी नहीं है, उस तापमान वाले प्लाज्मा को लंबे समय तक रोके रखना भी जरूरी होता है.

चीन का कहना है कि उसके पास एक और फ्यूजन डिवाइस HL-3 भी है. मार्च 2025 में इस मशीन ने आयन तापमान करीब 11.7 करोड़ डिग्री सेल्सियस और इलेक्ट्रॉन तापमान करीब 16 करोड़ डिग्री सेल्सियस तक पहुंचाया था. अब भारत भी फ्यूजन की इसी बेहद कठिन तकनीक को आगे बढ़ाने में जुटा है.

इस सवाल का जवाब छिपा सूरज की ताकत में छिपा है. असल में सूरज लगातार ऊर्जा पैदा करता है. उसके अंदर बेहद ज्यादा तापमान और दबाव के कारण हाइड्रोजन जैसे हल्के परमाणु आपस में जुड़ते हैं. इस प्रक्रिया को न्यूक्लियर फ्यूजन यानी नाभिकीय संलयन कहा जाता है. इसी प्रक्रिया से भारी मात्रा में ऊर्जा निकलती है.

वैज्ञानिक चाहते हैं कि सूरज के अंदर होने वाली इसी प्रक्रिया को धरती पर नियंत्रित तरीके से किया जाए. अगर ऐसा संभव हो गया तो भविष्य में दुनिया को बिजली पैदा करने का एक बेहद शक्तिशाली और अपेक्षाकृत स्वच्छ तरीका मिल सकता है. हालांकि ऐसा करना आसान नहीं है और इसके लिए वैज्ञानिकों को कठिन चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है.

दरअसल सूरज बहुत बड़ा है. उसका जबरदस्त गुरुत्वाकर्षण उसके अंदर मौजूद गर्म पदार्थ को बांधे रखता है. वहीं, धरती पर वैज्ञानिकों के पास ऐसा विशाल गुरुत्वाकर्षण नहीं है. इस कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने टोकामक नाम की मशीन विकसित की है.

टोकामक को आसान भाषा में एक बड़े डोनट के आकार की मशीन समझ सकते हैं. इसके अंदर गैस को इतना गर्म किया जाता है कि वह प्लाज्मा बन जाती है. इसके बाद शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र की मदद से इस प्लाज्मा को मशीन की दीवारों से दूर रखा जाता है. क्योंकि प्लाज्मा का तापमान इतना ज्यादा होता है कि अगर वह सीधे मशीन की दीवार को छू जाए तो बड़ी समस्या पैदा हो सकती है.

भारत की SST-1 यानी Steady State Superconducting Tokamak इसी तरह की प्रयोगात्मक फ्यूजन मशीन है. इसका मकसद फ्यूजन के लिए जरूरी बेहद गर्म प्लाज्मा को पैदा करना और उसे लंबे समय तक नियंत्रित करने की तकनीक को समझना है. भारतीय वैज्ञानिक इससे पहले ही फ्यूजन प्रयोग करके 20 करोड़ डिग्री सेल्सियस से ज्यादा तापमान वाला प्लाज्मा हासिल कर चुके हैं. यह तापमान सूरज के केंद्र के तापमान से करीब 20 गुना ज्यादा है.

अब सवाल उठता है कि जब भारत इतना ज्यादा तापमान पैदा कर चुका है तो नया गायरो ट्रॉन लगाने की जरूरत क्यों पड़ी? असल में केवल तापमान बढ़ाना नहीं, बल्कि उससे उत्पन्न हुए प्लाज्मा को संभालना असली चुनौती होती है. नया 82.6 GHz, 400 kW गायरो ट्रॉन इसी काम में मदद करेगा. गायरो ट्रॉन एक ऐसी मशीन है जो बेहद उच्च आवृत्ति वाली माइक्रोवेव ऊर्जा पैदा करती है. यह ऊर्जा टोकामक के अंदर मौजूद प्लाज्मा को गर्म करने के लिए इस्तेमाल की जाती है.

भारत में इस्तेमाल होने वाला नया सिस्टम पहले की व्यवस्था की तुलना में ज्यादा क्षमता देता है. इससे वैज्ञानिक ज्यादा गर्म प्लाज्मा और उसके व्यवहार का बेहतर अध्ययन कर सकेंगे.
वैज्ञानिकों के अनुसार, अगर फ्यूजन तकनीक भविष्य में सफल हो जाती है तो इसका फायदा सिर्फ वैज्ञानिकों या अंतरिक्ष अनुसंधान को नहीं होगा. इसका सीधा असर आम आदमी की जिंदगी पर पड़ेगा. आज बिजली बनाने के लिए बड़े पैमाने पर कोयला, तेल और गैस जैसे ईंधनों का इस्तेमाल होता है. इनसे प्रदूषण और कार्बन उत्सर्जन की समस्या पैदा होती है. लेकिन आर्टिफिशियल सूरज से बनने वाली बिजली से ये सब दिक्कतें दूर हो जाएंगी.

अगर वैज्ञानिक फ्यूजन को व्यावहारिक तरीके से इस्तेमाल करने में सफल होते हैं तो भविष्य में बड़े पैमाने पर बिजली पैदा करने का एक नया रास्ता खुल सकता है. इससे बिजली उत्पादन के लिए कोयले और गैस जैसे पारंपरिक ईंधनों पर निर्भरता कम करने में मदद मिलेगी.

फिलहाल यह समझने की जरूरत है कि SST-1 एक प्रयोगात्मक फ्यूजन मशीन है. नया गायरो ट्रॉन भी बिजली बनाने वाला जनरेटर नहीं है. यह प्लाज्मा को गर्म करने के लिए इस्तेमाल होने वाला शक्तिशाली सिस्टम है. यानी भारत अभी उस मंजिल तक नहीं पहुंचा है जहां फ्यूजन से व्यावसायिक स्तर पर बिजली पैदा की जा सके.

इसके बावजूद वैज्ञानिकों के लिए यह कदम महत्वपूर्ण है. इसकी वजह ये है कि फ्यूजन ऊर्जा की राह में सबसे मुश्किल कामों में से एक है और वह अत्यधिक गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित रखना.

चीन ने EAST के जरिए लंबे समय तक बेहद गर्म प्लाज्मा को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं. भारत SST-1 के जरिए अपनी फ्यूजन तकनीक को मजबूत कर रहा है. दुनिया के कई देश फ्यूजन पर काम कर रहे हैं क्योंकि अगर यह तकनीक व्यावहारिक बन गई तो ऊर्जा के क्षेत्र का पूरा समीकरण बदल सकता है.

गुजरात में SST-1 पर लगाया गया नया गायरो ट्रॉन इसी लंबे सफर का एक अहम कदम है. आने वाले वर्षों में वैज्ञानिक प्लाज्मा को लंबे समय तक स्थिर रखने और फ्यूजन से लगातार ऊर्जा हासिल करने में सफल हो गए, तो इसका असर सिर्फ वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहेगा.

तब दुनिया के सामने ऊर्जा का एक ऐसा विकल्प हो सकता है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए बिजली की जरूरत पूरी करने में बड़ी भूमिका निभाए. यानी वैज्ञानिकों का सपना कामयाब हुआ तो भविष्य में भारत का यह ‘नकली सूरज’ करोड़ों घरों को रोशन करने की वजह बन सकता है.