राफेल-सुखोई उड़ाने वाले भारतीय पायलट अब ब्रिटिश पायलटों को देंगे ट्रेनिंग

भारतीय वायु सेना के पायलट अब सिर्फ अंतरराष्ट्रीय अभ्यासों में हिस्सा नहीं ले रहे बल्कि दुनिया की बड़ी वायु सेनाओं को ट्रेनिंग भी दे रहे हैं. पहली बार तीन आईएएफ क्वालिफाइड फ्लाइंग इंस्ट्रक्टर्स यानी योग्य उड़ान प्रशिक्षक ब्रिटेन जा रहे हैं. ये रॉयल एयर फोर्स के युवा फाइटर पायलटों को ट्रेनिंग देंगे. टीम का नेतृत्व स्क्वाड्रन लीडर रैंक के अधिकारी कर रहे हैं. ये वेल्स स्थित आरएएफ वैली में तैनात होंगे जो ब्रिटिश फास्ट-जेट पायलटों का मुख्य ट्रेनिंग बेस है. यह भारत-यूके रक्षा सहयोग का नया और महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है. भारतीय प्रशिक्षक बीएई हॉक टी2 एडवांस्ड जेट ट्रेनर पर ब्रिटिश पायलटों को सिखाएंगे. यह विमान आरएएफ और आईएएफ दोनों इस्तेमाल करते हैं. हॉक फास्ट-जेट ट्रेनिंग का अंतिम चरण है. इसके बाद पायलट फ्रंटलाइन फाइटर विमानों पर जाते हैं जो ज्यादा तेज, भारी और जटिल होते हैं.

भारतीय प्रशिक्षक दो साल तक वहां रहेंगे. इस दौरान वे आईएएफ कमांड के अधीन रहेंगे लेकिन आरएएफ कमांडरों के साथ मिलकर उड़ान निर्देश देंगे. यह पहली बार है जब आईएएफ के क्यूएफआई आरएएफ वैली में आरएएफ पायलटों को ट्रेन करेंगे. यह तैनाती ऐतिहासिक महत्व रखती है. रॉयल एयर फोर्स ने ब्रिटिश भारत में सैन्य विमानन की नींव रखने में अहम भूमिका निभाई थी. भारतीय वायुसेना 1932 में बनी थी. करीब एक सदी बाद समीकरण बदल गया है. अब भारतीय फाइटर पायलट ब्रिटिश समकक्षों को उड़ान कौशल सिखा रहे हैं. यह बदलाव भारत की सैन्य विमानन क्षमताओं के विकास और वैश्विक विश्वास को दर्शाता है. पहले भारतीय पायलट पश्चिमी वायुसेनाओं से सीखते थे. अब वे खुद उन्हें ट्रेन कर रहे हैं. यह फैसला नई दिल्ली में हुए 19वें यूके-भारत एयर स्टाफ टॉक्स के बाद लिया गया. दोनों देशों ने सैन्य ट्रेनिंग और पेशेवर आदान-प्रदान बढ़ाने पर सहमति जताई.

भारत-यूके रक्षा संबंध अब सिर्फ अभ्यास और उपकरणों तक सीमित नहीं रहे. विशेषज्ञता के आदान-प्रदान तक पहुँच गए हैं. जनवरी में एक आईएएफ अधिकारी आरएएफ कॉलेज क्रैनवेल में इंस्ट्रक्टर के रूप में तैनात हुए थे. वहाँ आरएएफ के नए अधिकारियों को ट्रेन किया जाता है. भारतीय थलसेना और नौसेना के अधिकारी भी ब्रिटिश सैन्य अकादमियों में शिक्षण कार्य कर रहे हैं. आरएएफ वैली वाली तैनाती अब इसे ऑपरेशनल फ्लाइंग क्षेत्र में ले गई है. यह कदम ऐसे समय आया है जब भारतीय वायु सेना के पायलटों की उड़ान और ऑपरेशनल योग्यता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ज्यादा मान्यता मिल रही है.

ऑपरेशन सिंदूर जैसे युद्ध अभियानों और जटिल बहुराष्ट्रीय अभ्यासों में आईएएफ पायलट दुनिया की सबसे उन्नत वायुसेनाओं के साथ काम कर चुके हैं. इन अभ्यासों से भारतीय पायलटों को अलग-अलग सिद्धांत, रणनीति, विमान और हवाई मुकाबले के अनुभव मिलते हैं. साथ ही साझेदार वायुसेनाएं भारतीय पायलटों के युद्ध अनुभव और दृष्टिकोण को देख पाती हैं. इससे आईएएफ पायलट सिर्फ प्रतिभागी नहीं बल्कि प्रशिक्षक के रूप में भी उभर रहे हैं जो विशेषज्ञ उड़ान कौशल साझा कर सकते हैं आईएएफ के लिए यह सिर्फ नियमित आदान-प्रदान कार्यक्रम नहीं है. यह भारत की सैन्य विमानन क्षमताओं के विकास का प्रतीक है. भारतीय पायलटों पर वैश्विक भरोसा बढ़ रहा है. ऑपरेशन सिंदूर जैसे अभियानों ने उनकी युद्धक क्षमता साबित की. अब वे ब्रिटिश पायलटों को ट्रेन करके इस पहचान को और मजबूत कर रहे हैं. यह सहयोग दोनों देशों के रक्षा संबंधों को नई ऊँचाई पर ले जाएगा और भविष्य में और ज्यादा पेशेवर आदान-प्रदान का रास्ता खोलेगा.