यहां महिलाएं नहीं, पुरुष लेते हैं घूंघट, शादी के बाद छोड़ देते हैं अपना घर
दुनिया के सबसे रहस्यमयी और अनोखे समुदायों में से एक है सहारा रेगिस्तान की तुआरेग जनजाति. जहां भारत समेत ज्यादातर मुस्लिम और पारंपरिक समाजों में महिलाएं घूंघट या पर्दा करती हैं, वहीं तुआरेग संस्कृति में यह जिम्मेदारी पुरुषों की है. यहां मर्द ही अपना चेहरा और सिर लंबे नीले कपड़े ‘टैगेलमस्ट’ से ढंककर रखते हैं, जिसे वे ‘घूंघट’ की तरह इस्तेमाल करते हैं. जबकि महिलाएं बिना किसी पर्दे के खुले मुंह और चेहरे के साथ समाज में घूमती-फिरती हैं. तुआरेग लोग खुद को ‘केल तामाशेक’ कहते हैं और इन्हें ‘सहारा के नीले पुरुष’ के नाम से भी जाना जाता है. नीले कपड़े का रंग उनके चेहरे पर रगड़ से लग जाता है, जिस वजह से वे नीले दिखते हैं. लड़का जब वयस्क होता है तब पहली बार यह टैगेलमस्ट पहनता है और उसके बाद सार्वजनिक जगहों पर लगभग हमेशा चेहरा ढंके रखता है. यहां तक कि खाते समय भी मुंह ढंकना जरूरी माना जाता है.
इस समुदाय में मर्दों का सास-ससुर या पत्नी के परिवार के सामने मुंह खोलना अशिष्ट माना जाता है. लेकिन सबसे हैरान करने वाली बात तो उनकी सामाजिक व्यवस्था है. तुआरेग समाज मातृसत्तात्मक (matrilineal) है. यहां बच्चा मां की लाइन से संबंधित माना जाता है. नाम, संपत्ति और वंशज महिलाओं के माध्यम से आगे बढ़ते हैं. शादी के बाद पति पत्नी के तंबू में शिफ्ट हो जाता है. तंबू, पशुधन और जेवरात ज्यादातर पत्नी की संपत्ति होती है. महिला ही शादी में तंबू लाती है. तलाक की स्थिति में पति को ही तंबू छोड़कर जाना पड़ता है. बच्चे मां के पास रहते हैं. महिलाओं को तलाक लेने में कोई शर्म नहीं मानी जाती है. वे अपनी मर्जी से शादी चुन सकती हैं और समाज में स्वतंत्रता के साथ घूम-फिर सकती हैं. हालांकि यह पूरी तरह महिला शासन नहीं है. जनजाति के सरदार और सार्वजनिक नेता आमतौर पर पुरुष ही होते हैं. लेकिन नेतृत्व का पद भी मां की लाइन से ही आगे बढ़ता है. यानी महिलाओं की भूमिका बेहद मजबूत है, लेकिन पारंपरिक अर्थों में वे ‘शासक’ नहीं हैं.
तुआरेग पुरुषों का यह नीला घूंघट ना सिर्फ सांस्कृतिक प्रतीक है, बल्कि रेगिस्तान की धूल, रेत और तेज धूप से बचाव का भी साधन है. यह उनकी पहचान बन गया है. महिलाएं चमकीले रंगों के कपड़े पहनती हैं और खुलकर संगीत, नृत्य और सामाजिक गतिविधियों में भाग लेती हैं. आधुनिक समय में तुआरेग समुदाय माली, नाइजर, अल्जीरिया, लीबिया और बुर्किना फासो जैसे देशों में फैला हुआ है. हालांकि शहरीकरण और आधुनिक शिक्षा के प्रभाव से कई युवा परंपराओं से दूर हो रहे हैं, लेकिन गांवों और रेगिस्तानी इलाकों में यह परंपरा अभी भी मजबूती से जीवित है. सोशल मीडिया पर तुआरेग संस्कृति की तस्वीरें और वीडियो वायरल होने के बाद दुनिया भर में इसकी चर्चा हो रही है. कई लोग इसे ‘उल्टी परंपरा’ कह रहे हैं. कुछ इसे महिला सशक्तिकरण का उदाहरण बता रहे हैं, तो कुछ इसे बस एक अलग सांस्कृतिक व्यवस्था मान रहे हैं. भारतीय संदर्भ में देखें तो यहां महिलाओं को घर छोड़कर ससुराल जाने की परंपरा है, जबकि तुआरेग में उलटा है. यहां पुरुष को पत्नी के घर शिफ्ट होना पड़ता है. संपत्ति भी मां की तरफ से मिलती है. तुआरेग महिलाएं पढ़ी-लिखी, स्वतंत्र और आत्मनिर्भर होती हैं. वे व्यापार भी करती हैं. पुरुष ज्यादातर ऊंटों की देखभाल, व्यापार और रेगिस्तानी यात्राओं में व्यस्त रहते हैं. यह संस्कृति हमें सिखाती है कि दुनिया में रिवाज कितने विविध हो सकते हैं. एक ही चीज जो एक जगह पर्दे की प्रतीक है, दूसरी जगह पुरुषों की गरिमा और परंपरा का प्रतीक बन जाती है.
