MR-Linac क्या है? अब ट्यूमर को ‘लाइव’ देखकर खत्म करेगी ये मशीन

कैंसर का नाम सुनते ही सबसे पहला डर रेडिएशन थेरेपी के साइड इफेक्ट्स का आता है. रेडिएशन में सबसे बड़ी चुनौती यह होती थी कि ट्यूमर शरीर के अंदर स्थिर नहीं रहता. सांस लेने, ब्लेडर में पेशाब भरना या डायजेशन प्रोसेस के कारण ट्यूमर और उसके आसपास के अंग अपनी जगह बदलते रहते हैं. इस वजह से कई बार स्वस्थ टिशूज पर भी रेडिएशन का असर पड़ता था. लेकिन अब इस गंभीर समस्या का एक बेहद आधुनिक और सटीक सॉल्यूशन भारत आ चुका है.

बेंगलुरु के हेल्थकेयर ग्लोबल एंटरप्राइज (HCG) कैंसर सेंटर ने कर्नाटक की पहली Elekta Unity MR-Linac मशीन से मरीजों का इलाज शुरू कर दिया है. यह टेक्नोलॉजी एमआरआई की साफ तस्वीरों और रेडिएशन डिलीवरी को एक साथ मिलाकर काम करती है. आइए डिटेल में समझते हैं कि यह टेक्नोलॉजी कैसे काम करती है और कैंसर मरीजों के लिए यह कितनी बड़ी खुशखबरी है.

सरल शब्दों में समझें तो कैंसर के इलाज में रेडिएशन थेरेपी का इस्तेमाल कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करने के लिए उच्च ऊर्जा वाली किरणों से किया जाता है. लेकिन समस्या यह है कि ट्यूमर शरीर के अंदर एक जगह टिका हुआ पत्थर नहीं है. जब मरीज सांस लेता है, तो फेफड़े या पेट के ट्यूमर हिलते हैं. जब मूत्राशय (bladder) भरता है या मलाशय (rectum) की स्थिति बदलती है, तो आसपास के अंग खिसक जाते हैं.

एमआर लिनेक (MR-Linac) दो मुख्य तकनीकों से मिलकर बना है. इसमें एक शक्तिशाली 1.5-टेसला एमआरआई स्कैनर और एक लीनियर एक्सीलेटर को एक ही मशीन में जोड़ा गया है. यानी जिस समय मरीज को रेडिएशन दिया जा रहा होता है, ठीक उसी समय मशीन के अंदर उसका एमआरआई भी चल रहा होता है.

पहले जब मरीजों का रेडिएशन ट्रीटमेंट होता था, तो इलाज शुरू होने से कई दिन पहले मरीज का सीटी स्कैन या एमआरआई किया जाता था. उसी पुरानी तस्वीर के आधार पर कई हफ्तों का रेडिएशन प्लान तैयार होता था. डॉक्टरों को ट्यूमर के हिलने-डुलने की आशंका को देखते हुए एक बड़ा सेफ्टी मार्जिन रखना पड़ता था.

इस वजह से ट्यूमर के आसपास के स्वस्थ अंगों को भी रेडिएशन झेलना पड़ता था. Elekta Unity MR-Linac ने इस पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह बदल दिया है. अब डॉक्टर इलाज की टेबल पर मरीज के लेटने के बाद उसी पल की ताजा एमआरआई तस्वीर देखते हैं और फिर रेडिएशन देते हैं.

इस तकनीक का सबसे महत्वपूर्ण और क्रांतिकारी शब्द है अडैप्टिव. अडैप्टिव का मतलब है परिस्थिति के अनुसार तुरंत बदलाव कर लेना.

मान लीजिए कि मरीज के रेडिएशन का पहला सेशन सोमवार को हुआ और दूसरा सेशन मंगलवार को. मंगलवार को मरीज के पेट या मूत्राशय की स्थिति सोमवार जैसी नहीं होगी. ऐसे में एमआर लिनेक मशीन मंगलवार की स्थिति के हिसाब से रेडिएशन की बीम के आकार, दिशा और तीव्रता को तुरंत बदल देती है. यानी हर दिन का इलाज उस दिन के शरीर के आकार और ट्यूमर की सटीक स्थिति पर आधारित होता है.

कैंसर के इलाज में डॉक्टरों का मुख्य लक्ष्य होता है कि ट्यूमर को अधिकतम रेडिएशन मिले जिससे कैंसर कोशिकाएं पूरी तरह खत्म हो जाएं, लेकिन साथ ही आसपास के स्वस्थ ऊतकों को कम से कम रेडिएशन पहुंचे.

अगर रेडिएशन स्वस्थ अंगों पर पड़ता है, तो मरीज को कई तरह की गंभीर परेशानियां और साइड इफेक्ट्स होने लगते हैं. एमआरआई में सॉफ्ट टिश्यू (नरम ऊतकों) की बहुत स्पष्ट और साफ तस्वीरें दिखती हैं. इस वजह से डॉक्टर ट्यूमर के किनारों को बहुत सटीकता से पहचान पाते हैं और स्वस्थ अंगों को बचा लेते हैं.

पुरुषों में होने वाला प्रोस्टेट कैंसर इस तकनीक के लिए सबसे उपयुक्त उदाहरण है. प्रोस्टेट ग्रंथि मूत्राशय (bladder) और मलाशय (rectum) के ठीक बीच में स्थित होती है. मूत्राशय में पानी की मात्रा या मलाशय में गैस की वजह से प्रोस्टेट हर रोज अपनी जगह बदलता रहता है.

2025 में प्रकाशित एक वैज्ञानिक रिसर्च और MIRAGE क्लिनिकल ट्रायल के नतीजों के अनुसार, एमआर-गाइडेड रेडिएशन थेरेपी लेने वाले प्रोस्टेट कैंसर के मरीजों में पेशाब संबंधी और आंतों से जुड़ी समस्याएं बहुत कम देखी गईं. नार्मल सीटी-गाइडेड रेडिएशन की तुलना में एमआर-गाइडेड रेडिएशन में साइड इफेक्ट्स का खतरा काफी कम हो जाता है.

बेंगलुरु के HCG कैंसर अस्पताल में इस तकनीक का इस्तेमाल करके पहला इलाज एक 74 वर्षीय बुजुर्ग मरीज का किया गया. वे हाई-रिस्क प्रोस्टेट कैंसर से पीड़ित थे.

उन्हें हाइपोफ्रैक्शनेटेड रेडिएशन थेरेपी दी गई. एमआर-गाइडेड तकनीक के कारण उनका 5 हफ्तों का इलाज बिना किसी रुकावट, बिना किसी बड़े साइड इफेक्ट और बिना किसी परेशानी के सफलतापूर्वक पूरा हो गया. यह भारत में कैंसर इलाज की दिशा में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर साबित हो रहा है.

क्या यह तकनीक हर तरह के कैंसर मरीज के लिए सही है?
एमआर लिनेक निस्संदेह रेडिएशन ऑन्कोलॉजी के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा चमत्कार है, लेकिन यह हर कैंसर या हर मरीज के लिए एक समान यूनिवर्सल इलाज नहीं है.

मरीज को इस तकनीक की जरूरत है या नहीं, यह कई बातों पर निर्भर करता है:

ट्यूमर शरीर में किस जगह पर मौजूद है.

कैंसर की स्टेज और उसकी प्रकृति कैसी है.

मरीज का पहले कोई इलाज या सर्जरी हुई है या नहीं.

मरीज के शरीर की अंदरूनी बनावट कैसी है.

इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर डॉक्टरों की एक्सपर्ट टीम ही यह तय करती है कि मरीज के लिए एमआर लिनेक सही रहेगा या पारंपरिक तकनीक.

जैसे-जैसे मेडिकल साइंस आगे बढ़ रहा है, कैंसर के इलाज को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित और प्रभावी बनाने की कोशिशें जारी हैं. Elekta Unity MR-Linac जैसी तकनीकें यह साबित करती हैं कि आने वाले समय में कैंसर का इलाज दर्दनाक या भारी साइड इफेक्ट्स वाला नहीं रहेगा.

रियल टाइम एमआरआई इमेजिंग और अडैप्टिव प्लानिंग के संगम ने डॉक्टरों को एक ऐसा शक्तिशाली हथियार दे दिया है, जिससे वे ट्यूमर को लाइव ट्रैक करके उस पर सटीक हमला कर सकते हैं. कर्नाटक और बेंगलुरु के मरीजों के लिए यह सुविधा घर के पास उपलब्ध होना एक बहुत बड़ी राहत की बात है.