देश की वो रहस्यमी जगह, जहां हैं 99,99,999 मूर्तियां

भारत में ऐसी अनगिनत जगहें हैं, जहां पहुंचकर लगता है जैसे हम किसी रहस्य की दुनिया में आ गए हों. कहीं पहाड़ों के बीच छिपे प्राचीन मंदिर हैं, तो कहीं ऐसी गुफाएं और चट्टानें हैं, जिन पर सदियों पुरानी कहानियां आज भी जिंदा हैं. राजस्थान का कुलधरा, हिमाचल की रहस्यमयी झीलें और उत्तराखंड के प्राचीन मंदिरों की तरह त्रिपुरा का उनाकोटी भी अपनी अनोखी कहानी और रहस्यमयी मूर्तियों के लिए जाना जाता है. घने जंगलों और पहाड़ियों के बीच मौजूद इस जगह की सबसे बड़ी खासियत यहां चट्टानों पर उकेरी गई विशाल देवी-देवताओं की आकृतियां हैं. हैरानी की बात यह है कि इन मूर्तियों की संख्या 99 लाख 99 हजार 999 बताई जाती है, यानी एक करोड़ से बस एक कम.

उनाकोटी की चर्चा होते ही सबसे पहले इसी संख्या का जिक्र होता है. मान्यता है कि यहां करीब 99 लाख 99 हजार 999 देवी-देवताओं की मूर्तियां मौजूद हैं. हालांकि, इतनी बड़ी संख्या में मूर्तियों की गिनती करना संभव नहीं है और यह संख्या मुख्य रूप से स्थानीय मान्यताओं और प्रचलित कथाओं से जुड़ी हुई है. लेकिन सवाल यह है कि आखिर उनाकोटी में इतनी सारी मूर्तियां किसने बनाईं? इन्हें चट्टानों पर कैसे उकेरा गया होगा? और संख्या एक करोड़ से सिर्फ एक कम ही क्यों बताई जाती है? इन सवालों का कोई पक्का जवाब आज तक सामने नहीं आया है. यही वजह है कि उनाकोटी के साथ कई पौराणिक कथाएं जुड़ गई हैं.

त्रिपुरा का उनाकोटी एक प्राचीन शैव तीर्थस्थल (भगवान शिव को समर्पित पवित्र स्थल) है. यहां पहाड़ियों और बड़ी-बड़ी चट्टानों को काटकर देवी-देवताओं की आकृतियां बनाई गई हैं. माना जाता है कि इन शैल नक्काशियों का निर्माण करीब 7वीं से 9वीं शताब्दी के बीच हुआ था. यह पूरा क्षेत्र लगभग 150 एकड़ में फैला हुआ बताया जाता है. चारों तरफ हरियाली, घने जंगल और ऊंची-नीची पहाड़ियों के बीच अचानक चट्टानों पर बनी विशाल प्रतिमाएं दिखाई देती हैं. यही नजारा उनाकोटी को बाकी धार्मिक स्थलों से अलग बनाता है.
अपनी विशाल शैल नक्काशियों के कारण उनाकोटी को कई बार ‘पूर्व का अंगकोर वाट’ भी कहा जाता है.

उनाकोटी की सबसे प्रसिद्ध मूर्तियों में भगवान शिव की विशाल आकृति शामिल है. इसे उनाकोटीश्वर काल भैरव के नाम से जाना जाता है. यह प्रतिमा करीब 30 फीट ऊंची बताई जाती है. इसके आसपास पहाड़ियों और चट्टानों पर गणेश, विष्णु, नंदी, दुर्गा, लक्ष्मी और दूसरे देवी-देवताओं की आकृतियां भी दिखाई देती हैं. यहां रावण की एक प्रतिमा भी बताई जाती है, जिसमें वह धनुष-बाण से निशाना साधते नजर आते हैं. इन प्रतिमाओं को देखकर आज भी यह अंदाजा लगाना मुश्किल है कि सदियों पहले बिना आधुनिक मशीनों के कलाकारों ने इतनी बड़ी शैल नक्काशियों को किस तरह तैयार किया होगा.

उनाकोटी से जुड़ी सबसे लोकप्रिय कहानी भगवान शिव से संबंधित है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, एक बार भगवान शिव एक करोड़ देवी-देवताओं के साथ काशी जा रहे थे. रास्ते में रात हो गई तो सभी ने एक पहाड़ी पर रुककर आराम करने का फैसला किया. मान्यता है कि उस समय इस जगह को रघुनंदन पहाड़ कहा जाता था. महादेव ने सभी देवी-देवताओं से कहा कि सुबह होते ही उन्हें काशी के लिए निकलना है. लेकिन अगली सुबह भगवान शिव के अलावा कोई भी समय पर नहीं जागा. कहा जाता है कि भगवान शिव इससे नाराज हो गए और अकेले ही काशी के लिए रवाना हो गए. जो देवी-देवता सोते रह गए, वो वहीं पत्थर की मूर्तियों में बदल गए. इसी कहानी को उनाकोटी में मौजूद एक करोड़ से एक कम मूर्तियों की मान्यता से जोड़कर देखा जाता है.

उनाकोटी से जुड़ी एक और लोकप्रिय लोककथा भगवान विश्वकर्मा के बेटे कल्लू कुमार की है. स्थानीय मान्यता के अनुसार, कल्लू कुमार भगवान शिव और माता पार्वती के साथ कैलाश जाना चाहते थे. लेकिन भगवान शिव उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए तैयार नहीं थे. इसके बाद कल्लू कुमार के सामने एक शर्त रखी गई। कहा गया कि अगर वह एक ही रात में एक करोड़ देवी-देवताओं की मूर्तियां बना दें, तो उन्हें कैलाश जाने का मौका मिलेगा. कल्लू कुमार ने यह चुनौती स्वीकार कर ली और रातभर मूर्तियां बनाने में जुटे रहे। कहा जाता है कि सुबह तक उन्होंने लगभग एक करोड़ मूर्तियां बना दीं. लेकिन जब गिनती हुई तो एक मूर्ति कम निकली. संख्या 99 लाख 99 हजार 999 थी. यानी एक करोड़ से एक कम. इसी वजह से इस जगह को ‘उनाकोटी’ नाम मिला. दरअसल, ‘उनाकोटी’ का अर्थ ही होता है एक करोड़ से एक कम.

उनाकोटी पहुंचने पर ऐसा लगता है जैसे पूरी पहाड़ी ही किसी विशाल मंदिर का हिस्सा हो. चट्टानों पर बनी छोटी-बड़ी आकृतियां जगह-जगह दिखाई देती हैं. कुछ प्रतिमाएं सीधे पहाड़ों को काटकर बनाई गई हैं, जबकि कुछ शैल आकृतियां आसपास की चट्टानों में नजर आती हैं. घने जंगलों और पहाड़ी वातावरण के बीच इन प्राचीन मूर्तियों को देखना अपने आप में एक अलग अनुभव है. यही वजह है कि यहां धार्मिक आस्था रखने वाले लोगों के साथ इतिहास और प्राचीन कला में दिलचस्पी रखने वाले लोग भी पहुंचते हैं. उनाकोटी के आसपास सीता कुंड भी मौजूद है. यहां जल की एक धारा निकलती है. इसे लेकर स्थानीय लोगों के बीच धार्मिक मान्यताएं प्रचलित हैं. मान्यता है कि सीता कुंड में स्नान करने से पुण्य मिलता है। इसी वजह से उनाकोटी आने वाले कई श्रद्धालु यहां भी पहुंचते हैं. उनाकोटी सिर्फ प्राचीन मूर्तियों के लिए ही नहीं, बल्कि धार्मिक आयोजनों के लिए भी जाना जाता है. हर साल अशोक अष्टमी के मौके पर यहां बड़ा मेला लगता है. इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उनाकोटी पहुंचते हैं और भगवान शिव की पूजा करते हैं. इस जगह की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अहमियत को देखते हुए इसे यूनेस्को की टेंटेटिव लिस्ट यानी अस्थायी सूची में भी शामिल किया गया है.