जैसे ही जमीन खोदो, निकल आते हैं नागराज, बुंदेलखंड के इस टीले में छिपा है 1000 साल पुराना रहस्य
मध्य प्रदेश के सागर जिले के ढाना गांव के पास स्थित पटनेश्वर धाम इन दिनों रहस्यमयी खोज को लेकर चर्चा में है. यहां जमीन की खुदाई में कलचुरी काल यानी 10वीं से 12वीं शताब्दी की प्राचीन मूर्तियां मिलने का दावा किया जा रहा है. स्थानीय लोगों का कहना है कि जैसे ही खुदाई शुरू होती है वहां नागराज निकलने लगते हैं, जिससे काम रोकना पड़ता है. विशेषज्ञों का मानना है कि यहां कभी प्राचीन मंदिर या बस्ती रही होगी जो समय के साथ मिट्टी में दब गई. अगर इस क्षेत्र में वैज्ञानिक तरीके से उत्खनन किया जाए तो कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक रहस्य सामने आ सकते हैं. वीर बुंदेलाओं की धरती कहे जाने वाले बुंदेलखंड का इतिहास सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं है. यहां की मिट्टी, खंडहर और पुराने टीले आज भी बीते समय की कहानियां सुनाते हैं. सागर जिले के ढाना गांव के पास स्थित पटनेश्वर धाम इन दिनों एक रहस्यमयी वजह से चर्चा में है. यहां जमीन की खुदाई के दौरान लगातार प्राचीन मूर्तियां और पत्थर निकल रहे हैं. स्थानीय लोगों का दावा है कि ये मूर्तियां हजारों साल पुरानी हैं और संभवतः किसी प्राचीन मंदिर या बस्ती के अवशेष हैं.
स्थानीय लोगों के मुताबिक यहां खुदाई में जो मूर्तियां निकल रही हैं, उन्हें कलचुरी काल यानी 10वीं से 12वीं शताब्दी के आसपास का माना जा रहा है. हालांकि अभी तक इसका कोई आधिकारिक पुरातात्विक सर्वे नहीं हुआ है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि यह स्थान शोध का बड़ा विषय हो सकता है.इस जगह को लेकर सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जैसे ही जमीन की खुदाई शुरू होती है, वहां से अचानक नाग देवता यानी सांप निकलने लगते हैं. इसी वजह से कई बार खुदाई का काम बीच में ही रोकना पड़ जाता है. ढाना के चौबे परिवार का कहना है कि वे पिछले तीन पीढ़ियों से यह नजारा देखते आ रहे हैं.42 एकड़ जमीन के मालिक रज्जन चौबे बताते हैं कि जहां आज उनकी जमीन है, वहां पहले पटना नाम का एक बड़ा गांव हुआ करता था. उनके मुताबिक यह गांव करीब 8 किलोमीटर के दायरे में फैला हुआ था. संभव है कि यहां कभी कोई प्राचीन मंदिर या मठ रहा हो, जो समय के साथ हमलों, पलायन या पानी की कमी जैसी वजहों से नष्ट हो गया और धीरे-धीरे मिट्टी में दब गया.
बुंदेलखंड की लोक कथाओं में कहा जाता है कि जहां जमीन के अंदर धन या प्राचीन खजाना छिपा होता है, वहां सांपों का डेरा हो जाता है. स्थानीय लोग मानते हैं कि यहां भी कुछ ऐसा ही हो सकता है. इसी वजह से लोग इस जगह को लेकर श्रद्धा और डर दोनों महसूस करते हैं और अब कोई भी ज्यादा गहराई तक खुदाई करने की हिम्मत नहीं करता.
डॉ. हरिसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय सागर के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति और पुरातत्व विभाग के अध्यक्ष डॉ. नागेश दुबे बताते हैं कि ढाना और आसपास का क्षेत्र काफी प्राचीन है. उनके अनुसार 10वीं से 12वीं शताब्दी के बीच इस इलाके में कलचुरी शासकों का शासन रहा होगा और उन्होंने यहां शैव धर्म से जुड़े मंदिर भी बनवाए थे.
डॉ. दुबे का मानना है कि जब ये मंदिर नष्ट हुए तो उनके अवशेष जमीन के अंदर दब गए और धीरे-धीरे टीले बन गए. यदि यहां वैज्ञानिक तरीके से पुरातात्विक उत्खनन किया जाए तो निश्चित रूप से कई महत्वपूर्ण ऐतिहासिक अवशेष सामने आ सकते हैं.
