NASA ने 6 साल स्पेस में रहे 1.25 करोड़ टमाटर के बीजों को 40 देशों में बोया

वॉशिंगटन: अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने 1984 में टमाटर के करोड़ों (1.25 करोड़) बीज अंतरिक्ष में भेजे थे, वे छह साल बाद 1990 में पृथ्वी पर वापस लाए गए तो उन्हें छात्रों के बीच प्लांट किट के तौर पर बांटा गया। ऐसे में ये बीज दुनिया के 40 देशों के करीब 40,000 स्कूलों में बोए गए। इसका मकसद यह पता लगाना था कि क्या अंतरिक्ष के माहौल में रहने से बीजों के अंकुरण और पौधों की बढ़त पर कोई असर पड़ता है। रिसर्च में काफी दिलचस्प नतीजे सामने आए।

नासा के इस प्रोजेक्ट का नाम SEEDS (Space Exposed Experiment Developed for Students) यानी छात्रों के लिए अंतरिक्ष में किए जाने वाले प्रयोग था। इसमें NASA हेडक्वार्टर, लैंगली रिसर्च सेंटर और अमेरिका में बीजों की पारंपरिक सप्लायर कंपनी ‘जॉर्ज डब्ल्यू. पार्क सीड’ शामिल थीं।
इस प्रयोग के पीछे आइडिया यह था कि बीजों का एक ग्रुप अंतरिक्ष में भेजा जाए और एक ग्रुप पृथ्वी पर रखा जाए। फिर एक जैसे बीजों के दोनों सेट स्कूलों में बांटे जाएं ताकि छात्र उन्हें अगल-बगल उगा सकें और नतीजों की तुलना कर सकें। सभी 1.25 करोड़ बीज ‘रटगर्स कैलिफोर्निया सुप्रीम’ किस्म के थे, जो अमेरिका में उगाई जाने वाली टमाटर की एक आम किस्म है।

इस बीज को इसलिए चुना गया था क्योंकि एक ही किस्म का इस्तेमाल करने से जेनेटिक अंतर के कारण नतीजों में गड़बड़ी नहीं होती। जिन उपकरणों से बीजों को अंतरिक्ष में ले जाया गया, वह ‘लॉन्ग ड्यूरेशन एक्सपोजर फैसिलिटी’ (LDEF) था। यह 12 तरफ वाला बेलनाकार ढांचा था, जिसका वजन 9.7 टन था। इसे अंतरिक्ष में स्थिर रहने के लिए डिजाइन किया गया था।

इन बीजों की वापसी के बाद योजना के अनुसार प्रोजेक्ट का शैक्षिक चरण शुरू हुआ। NASA की एक शैक्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 40,000 स्कूलों में शिक्षकों को करीब 1,32,000 प्लांटिंग किट बांटी गईं, जो 33 लाख छात्रों तक पहुंचीं। इसमें अमेरिका के सभी 50 राज्य, डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया और दुनिया के 30 अन्य देश शामिल थे।

हर किट में बीजों के दोनों समूह थे। वे बीज जिन्होंने अंतरिक्ष में लगभग छह साल बिताए थे और वे जिन्हें उतने ही समय तक नियंत्रित वातावरण में रखा गया था। दूसरे समूह को विज्ञान की भाषा में ‘कंट्रोल’ कहा जाता है। यह एक बेंचमार्क के तौर पर काम करता है, जिससे यह पता लगाया जा सके कि देखे गए कोई भी अंतर असल में उस यात्रा की वजह से थे ना कि बीज की किस्म या बोने के तरीके की वजह से।

छात्रों ने नोट किया कि कितने बीज अंकुरित हुए, पहला अंकुर निकलने में कितना समय लगा और हफ्तो के दौरान पौधे कैसे बढ़े। उन्होंने फूलों के दिखने, फल बनने और पत्तियों व तनों की हालत को भी नोट किया। नोट किया गया डेटा NASA को भेजा गया, जिसने एनालिसिस के लिए जानकारी को इकट्ठा किया। एजेंसी को पूरी क्लास की तरफ से करीब 8,000 रिपोर्ट मिलीं।

डेटा से पता चला कि स्पेस के बीजों के अंकुरण की दर 73.8% जबकि पृथ्वी के बीजों के लिए 70.3% थी। वापस लाने के बाद पहले छह महीनों में किए गए टेस्ट में स्पेस के बीजों में औसतन 8 दिनों में अंकुरण हुआ, जबकि पृथ्वी के बीजों में 8.3 दिन लगे। शुरुआती तीन हफ्तों में शुरुआती बढ़त तेजी से होने की प्रवृत्ति देखी गई। प्रोजेक्ट की समरी में पौधों या फलों के बीच कोई खास अंतर नहीं पाया गया। शुरुआती छोटे फायदे साइकल के अंत तक नहीं रहे।

SEEDS क्लासरूम में किए गए अब तक के सबसे बड़े साइंस प्रोजेक्ट में से एक है। इसमें ऐसी चीजों का इस्तेमाल किया गया, जो स्पेस में रखी गई थीं। यह प्रोजेक्ट भाग लेने वालों की संख्या और भौगोलिक पहुंच, दोनों ही मामलों में बहुत बड़ा रहा। इस एक्सपेरिमेंट से पता चला कि स्पेस में छह साल रहने के बाद भी टमाटरों में कोई स्थायी बदलाव नहीं आया। इसने लाखों स्टूडेंट्स को अपना खुद का स्पेस साइंस एक्सपेरिमेंट करने का अनोखा मौका जरूर दिया।