गगनयान की ‘सेफ लैंडिंग’ का रास्ता साफ! ISRO ने पार की एक और बड़ी बाधा
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) ने आज अपने सबसे महत्वाकांक्षी गगनयान (Gaganyaan) मिशन के लिए एक और बड़ी बाधा पार कर ली है. आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन स्पेस स्टेशन में इसरो ने दूसरे इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-02) को सफलतापूर्वक अंजाम दिया. केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने सोशल मीडिया के जरिए इसरो के वैज्ञानिकों को इस बड़ी कामयाबी की बधाई दी है. गगनयान मिशन के तहत यह टेस्ट इसलिए सबसे अहम माना जाता है क्योंकि यह एस्ट्रोनॉट्स की सुरक्षित ‘घर वापसी’ से जुड़ा है. आसान भाषा में समझें तो यह टेस्ट यह जांच करने के लिए किया जाता है कि जब गगनयात्री अंतरिक्ष से लौटेंगे, तो क्या उनके कैप्सूल (Crew Module) के पैराशूट सही समय पर खुलकर उसकी रफ्तार को कम कर पाएंगे? इस टेस्ट में एक आर्टिफिशियल क्रू मॉड्यूल (जिसका वजन करीब 5 टन होता है) को एक हेलिकॉप्टर के जरिए आसमान में ले जाया जाता है और एक निश्चित ऊंचाई से नीचे गिराया जाता है. जैसे ही मॉड्यूल नीचे गिरता है, उसके अंदर लगे 10 अलग-अलग पैराशूट एक निश्चित क्रम (Sequence) में खुलते हैं. ये पैराशूट मॉड्यूल की रफ्तार को इतना कम कर देते हैं कि वह समंदर में गिरते समय सुरक्षित रहे. यह टेस्ट सुनिश्चित करता है कि पैराशूट सिस्टम में कोई तकनीकी गड़बड़ी न हो, जिससे आने वाले समय में गगनयात्रियों की जान को कोई खतरा न रहे.
अंतरिक्ष से वापस लौटते समय कैप्सूल की रफ्तार हजारों किलोमीटर प्रति घंटा होती है. अगर इसे धीमा न किया जाए, तो यह जमीन या पानी से टकराते ही तबाह हो सकता है. गगनयान में कुल 10 पैराशूट का इस्तेमाल होगा. ये एक खास क्रम (Sequence) में खुलते हैं, जिससे कैप्सूल को झटके न लगें और वह धीरे-धीरे नीचे आए. आज के टेस्ट ने साबित कर दिया कि हमारा ‘पैराशूट सिस्टम’ पूरी तरह तैयार है. केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने अपने संदेश में स्पष्ट किया कि गगनयान भारत का पहला मानव अंतरिक्ष मिशन होगा, जो अगले साल यानी 2027 में लॉन्च के लिए पूरी तरह तैयार है. इस उड़ान से पहले इसरो तीन और ऐसे मिशन भेजेगा, जिनमें इंसान नहीं होंगे. इनमें से पहला अनमैन्ड मिशन इसी साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत में होने की उम्मीद है. इस मिशन के बाद भारत उन चुनिंदा देशों में शामिल हो जाएगा, जिनके पास इंसानों को अंतरिक्ष में भेजने की अपनी तकनीक है.
गगनयान मिशन अपनी हार्ड टेक्नोलॉजी के कारण कई बार टल चुका है, लेकिन इसरो चेयरमैन वी. नारायणन ने हाल ही में कहा था कि सभी तैयारियां सुचारू रूप से चल रही हैं. इस मिशन के लिए भारत सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये का बजट आवंटित किया है. गगनयान के जरिए भारत 3 एस्ट्रोनॉट्स को 400 किलोमीटर ऊपर की कक्षा में 3 दिनों के लिए भेजेगा और फिर उन्हें सुरक्षित रूप से भारत के समुद्री क्षेत्र (प्रशांत या हिंद महासागर) में वापस उतारेगा. सिर्फ मशीनों का ही नहीं, बल्कि एस्ट्रोनॉट्स का भी कड़ा टेस्ट हो रहा है. हाल ही में लद्दाख के लेह (Leh) में ‘मिशन मित्रा’ के तहत चारों एस्ट्रोनॉट्स (शुभांशु शुक्ला, प्रशांत नायर, अजीत कृष्णन और अंगद प्रताप) की ट्रेनिंग हुई है. वहां की कम ऑक्सीजन और कड़ाके की ठंड में यह जांचा गया कि वे अंतरिक्ष जैसे मुश्किल हालात में कैसे काम करेंगे.
इस मिशन की सबसे बड़ी बात यह है कि इसकी तकनीक को भारत ने खुद विकसित किया है. पैराशूट से लेकर लाइफ सपोर्ट सिस्टम तक, सब कुछ स्वदेशी है. दुनिया का कोई भी देश ऐसी ‘क्रिटिकल’ टेक्नोलॉजी आसानी से शेयर नहीं करता, इसलिए इसरो की यह कामयाबी भारत के लिए बहुत बड़े गर्व की बात है.
