रूस : महाविनाशकारी भूकंप के बाद फटा 5 सदियों से शांत ज्वालामुखी
रूस के सुदूर कामचटका प्रायद्वीप पर मौजूद क्राशेनिनिकोव ज्वालामुखी ने करीब पांच सदियों बाद भयानक अंगारे उगलना शुरू कर दिया है. करीब 500 साल से शांत पड़े इस ज्वालामुखी में अचानक हलचल शुरू हुई. अंतरिक्ष में चक्कर लगा रहे नासा और इसरो के संयुक्त सैटेलाइट निसार ने इस पूरी घटना को अपने रडार में कैद कर लिया है. NISAR सैटेलाइट पृथ्वी की सतह से लगभग 464 मील (743 से 747 किलोमीटर) की ऊंचाई पर पृथ्वी की परिक्रमा करता है. जुलाई 2025 में प्रशांत महासागर के भीतर 8.8 तीव्रता का भीषण भूकंप आया था. इस महाविनाशकारी भूकंप के कुछ ही दिन बाद इस सोए हुए पहाड़ के उत्तरी हिस्से से पिघले पत्थर और लावे की धार फूट पड़ी.
सैटेलाइट ने महीनों तक लगातार इस इलाके की निगरानी की. वैज्ञानिकों ने इस डेटा को मिलाकर एक अनोखा टाइम-लैप्स वीडियो तैयार किया है. यह वीडियो दिखाता है कि किस तरह लावा शिखर से निकलकर दूर तक अपनी जद फैला रहा है. धरती के किसी शांत पहाड़ के इस तरह जागने की ऐसी तस्वीर पहले कभी नहीं देखी गई थी.
दुनिया भर में जो ज्वालामुखी हर कुछ साल में फटते हैं, उन पर वैज्ञानिक जमीन पर यंत्र लगाकर चौबीसों घंटे नजर रखते हैं. जो पहाड़ सैकड़ों सालों तक शांत रहते हैं, उन पर किसी का ध्यान नहीं जाता है. रूस के कामचटका प्रायद्वीप पर स्थित क्राशेनिनिकोव भी ऐसा ही एक ज्वालामुखी था. यह वास्तव में दो ज्वालामुखियों का एक दुर्लभ जोड़ा है.
स्मिथसोनियन इंस्टीट्यूशन के ग्लोबल वोल्केनिज्म प्रोग्राम के मुताबिक इस पहाड़ में आखिरी बार विस्फोट करीब 1550 ईस्वी के आसपास हुआ था. इसके बाद से यह पूरी तरह खामोश पड़ा था.
धरती के भीतर जब मैग्मा सैकड़ों सालों तक धीरे-धीरे इकट्ठा होता है, तब बाहर कोई संकेत नहीं मिलता है. इस बार भी किसी को अंदाजा नहीं था कि यह दानव अचानक जाग जाएगा.
शांत पड़े पहाड़ की ढलानों पर कोई निगरानी उपकरण नहीं लगे थे. इसलिए जब इसमें हलचल शुरू हुई, तब अंतरिक्ष में घूम रहे सैटेलाइट ही इसे देखने का एकमात्र जरिया बने. देखिए वीडियो
क्राशेनिनिकोव के जागने की कहानी 30 जुलाई 2025 को आए एक जबर्दस्त भूकंप से जुड़ी है. कामचटका के पास समुद्र के भीतर 8.8 तीव्रता का महाविनाशकारी भूकंप दर्ज किया गया था. इस भूकंप के झटकों ने पूरे प्रशांत महासागर में सुनामी की लहरें दौड़ा दी थीं. इस प्राकृतिक आपदा के कुछ ही दिन बाद क्राशेनिनिकोव में लावा उबलने लगा.
भू-वैज्ञानिकों का मानना है कि इतने शक्तिशाली भूकंप की तरंगों ने जमीन के नीचे मौजूद मैग्मा चैंबर को बुरी तरह हिला दिया. धरती की ऊपरी परत में दरारें आ गईं और अंदर फंसी गैसों का दबाव अचानक बढ़ गया. इसके चलते दोनों शंक्वाकार चोटियों में से उत्तरी हिस्से ने पिघले हुए पत्थर और मलबे को पूर्व दिशा की ओर फेंकना शुरू कर दिया.
वैज्ञानिक अभी भी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि क्या भूकंप ने सीधे तौर पर इस विस्फोट को ट्रिगर किया था. कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिक और निसार साइंस टीम के सदस्य मैथ्यू प्रिचर्ड ने कहा, ‘इस तरह के दुर्लभ डेटा हमें जमीन के भीतर चल रही हलचलों को गहराई से समझने का मौका देते हैं.’
ज्वालामुखी जब फटता है, तब आसमान में भारी राख और धुएं का गुबार छा जाता है. ऐसे में साधारण कैमरे अंतरिक्ष से कुछ भी साफ नहीं देख पाते हैं. यहीं पर नासा और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी इसरो का साझा सैटेलाइट निसार काम आया. यह सैटेलाइट जमीन से 747 किलोमीटर यानी करीब 464 मील ऊपर पृथ्वी की कक्षा में चक्कर लगा रहा है.
यह सिस्टम हर सेकंड जमीन की तरफ हजारों माइक्रोवेव तरंगे भेजता है और उनकी गूंज को पकड़ता है. कामचटका का मौसम बेहद खराब रहता है और वहां अक्सर बर्फानी तूफान आते हैं. रडार की किरणें घने बादलों और तूफानों को चीरकर सीधे जमीन तक पहुंच जाती हैं.
इस सैटेलाइट में लगा एल-बैंड रडार लंबी तरंगों का इस्तेमाल करता है. ये किरणें पेड़ों की छतरी को पार करके जमीन की सतह की तस्वीर खींच लेती हैं. गर्म लावा आसपास की ठंडी जमीन या बर्फ की तुलना में माइक्रोवेव को ज्यादा चमकीला परावर्तित करता है. इसी वजह से रडार तस्वीरों में फैलता हुआ लावा एकदम साफ नजर आता है.
