60 करोड़ साल पुराना एक आंख वाला जीव! वैज्ञानिकों ने ढूंढा इंसानी नजर का सबसे पुराना पूर्वज
वैज्ञानिकों ने पाया कि इंसानी आंखों के तार 600 मिलियन साल पुराने एक समुद्री जीव से जुड़े हैं. हमारा यह पूर्वज एक ‘साइक्लोप्स’ (एक आंख वाला) जीव था, जिसकी सिर के ऊपर सिर्फ एक प्रकाश-संवेदी आंख थी. जब यह जीव ज्यादा सक्रिय हुआ, तो उसी एक आंख से विकसित होकर दो आंखें बनीं. हम अपनी आंखों से दुनिया के रंग, चेहरे और नजारे देखते हैं. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इंसानी आंखों की शुरुआत कहां से हुई? नई रिसर्च के मुताबिक, इसकी जड़ें करीब 60 करोड़ साल पहले रहने वाले एक छोटे से समुद्री जीव से जुड़ी हो सकती हैं, जिसकी सिर्फ एक आंख थी. लुंड यूनिवर्सिटी और University of Sussex के वैज्ञानिकों ने दावा किया है कि सभी वर्टेब्रेट यानी रीढ़ वाले जीव एक ऐसे पूर्वज से विकसित हुए, जिसके सिर के ऊपर एक सिंगल लाइट-सेंसिंग अंग था. यह स्टडी साइंस जर्नल Current Biology में प्रकाशित हुई है. रिसर्च में जिस जीव का जिक्र है, वह छोटा और नरम शरीर वाला था और प्राचीन समुद्रों में रहता था. यह पानी में तैरते प्लैंकटन को फिल्टर करके भोजन करता था और ज्यादातर स्थिर जीवन जीता था. वैज्ञानिकों का मानना है कि इस विकास क्रम की शुरुआती प्रजातियों में शायद दो आंखें थीं. लेकिन ये आंखें साफ तस्वीर देख पाती थीं या सिर्फ रोशनी पहचानती थीं, यह स्पष्ट नहीं है. समय के साथ, जब यह जीव कम सक्रिय जीवन जीने लगा, तो दो आंखों की जरूरत कम हो गई और वे संरचनाएं खत्म हो गईं.
दो आंखों के खत्म होने के बाद सिर के बीचों-बीच कुछ लाइट-सेंसिटिव कोशिकाएं बचीं. समय के साथ इन कोशिकाओं ने मिलकर एक साधारण “मीडियन आई” का रूप ले लिया. यह आंख सिर्फ रोशनी और अंधेरे का फर्क समझ सकती थी, लेकिन साफ तस्वीर बनाने की क्षमता इसमें नहीं थी. यह बदलाव दिखाता है कि विकास की प्रक्रिया सीधी नहीं होती. कई बार शरीर की संरचनाएं जरूरत के हिसाब से बदलती और फिर नए रूप में सामने आती हैं.बाद में जब इन जीवों की जीवनशैली बदली और वे ज्यादा सक्रिय होकर तैरने लगे, तो बेहतर स्पेशल अवेयरनेस की जरूरत पड़ी. वैज्ञानिकों के अनुसार, उसी मीडियन आई के कुछ हिस्सों ने दोबारा खुद को ढाला और नई जोड़ी आंखों का विकास हुआ, जो इमेज बना सकती थीं. यह प्रक्रिया कीड़ों या स्क्विड जैसे जीवों से अलग है. वर्टेब्रेट्स में रेटिना दिमाग के ऊतकों से विकसित होती है, जबकि कई अन्य जीवों में आंखें सिर के किनारों की त्वचा से बनती हैं. यही फर्क इस रिसर्च को खास बनाता है.
रिसर्च के मुताबिक, वह प्राचीन मीडियन आई पूरी तरह गायब नहीं हुई. उसका एक हिस्सा आज भी हमारे दिमाग में “पीनियल ग्लैंड” के रूप में मौजूद है. यह छोटी सी ग्रंथि दिमाग के बीच में स्थित होती है और रोशनी के सिग्नल पर प्रतिक्रिया देती है, हालांकि सीधे नहीं.
पीनियल ग्लैंड मेलाटोनिन नामक हार्मोन बनाती है, जो हमारी नींद और शरीर की जैविक घड़ी यानी सर्कैडियन रिद्म को नियंत्रित करता है. यानी दिन और रात के बदलाव को पहचानने की क्षमता कहीं न कहीं उसी प्राचीन लाइट-सेंसिंग सिस्टम से जुड़ी हो सकती है.
