वैज्ञानिकों को दिखा बृहस्पति जैसा ग्रह जो अभी बन रहा है

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ग्रहों का निर्माण कैसे हुआ, इसके बारे में मनुष्य की जो समझ है, वैज्ञानिकों की एक नई खोज ने उसे चुनौती दे दी है. अमेरिका के हवाई स्थित सुबारू टेलीस्कोप से वैज्ञानिकों ने एक ऐसा ग्रह देखा जो अभी बन रहा है. अंतरिक्ष में चक्कर काट रहे हबल टेलीस्कोप से इस ग्रह की और ज्यादा नजदीक से पड़ताल की गई तो कई हैरतअंगेज बातें पता चली हैं.

सुदूर अंतरिक्ष में जो यह नया ग्रह देखा गया है, इसका आकार बृहस्पति से नौ गुना बड़ा है लेकिन खगोलविदों का मानना है कि यह अभी गर्भ में है, यानी अपने निर्माण की बहुत ही शुरुआती अवस्था में है. यह सौरमंडल के सबसे बड़े ग्रह बृहस्पति से बहुत मिलता जुलता है. बृहस्पति और उसका साथी शनि ग्रह भी गैसीय ग्रह हैं और मुख्यतया हीलियम व हाइड्रोजन से बने हैं.

वैज्ञानिकों ने अब तक हमारे सौरमंडल के बाहर लगभग पांच हजार ग्रह या क्षुद्रग्रह खोजे हैं. इस नए ग्रह को एबी ऑर बी कहा गया है, जो अब तक खोजे गए ग्रहों में सबसे बड़ों में शामिल हो गया है. इससे पहले प्रोटोप्लैनेट यानी ऐसा ग्रह जो अभी निर्माण की अवस्था में है, सिर्फ एक बार देखा गया है.

पहले से अलग है एबी ऑर बी
अब तक जितने भी ग्रह मिले हैं वे अपने तारों से उतनी दूरी पर चक्कर काटते हैं जितना हमारे सूर्य से नेपच्यून है. लेकिन एबी पहला ऐसा ग्रह है जिसकी अपनी तारे से दूरी नेपच्यून और सूर्य के बीच की दूरी से तीन गुना है. यानी यह दूरी पृथ्वी और सूर्य के बीच की दूरी से 93 गुना ज्यादा है.

वैज्ञानिक कहते हैं कि अब तक ग्रहों के निर्माण की प्रक्रिया के बारे में जो जानकारी थी, एबी की निर्माण प्रक्रिया उससे अलग लगती है. अध्ययन के सह-लेखक और एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाने वाले खगोलविद ओलिवर गुयोन कहते हैं, “पारंपरिक समझ यह कहती है कि सभी नहीं तो ज्यादातर ग्रह बनने की प्रक्रिया ठोस पदार्थों के जमा होने से शुरू होती है. ये ठोस पदार्थ मिलकर एक मजबूत चट्टानी भीतरी भाग बनाते हैं. जब यह ठोस भीतरी भाग एक विशेष आकार ले लेता है तब गैसें जुड़ने लगती हैं और इस तरह गैसी ग्रह बनते हैं.”

लेकिन एबी के मामले जो तश्तरी नुमा चीजें तारे का चक्कर लगा रही हैं, उनमें मौजूद ठोस हिस्सा गैसों से बाहर आता जा रहा है. जब यह ठोस हिस्सा पृथ्वी से कई गुना भारी हो जाएगा तो उस तश्तरी में गैसों को अपनी ओर आकर्षित करेगा. गुयोन बताते हैं, “इस प्रक्रिया से जो ग्रह बनते हैं वे तारे से बहुत ज्यादा दूर नहीं हो सकते. इसलिए इस खोज ने ग्रह निर्माण के बारे में हमारी समझ को चुनौती दी है.”