गुटखे की पीक 70 साल पुराने कोलकाता के हावड़ा ब्रिज को कर रही कमजोर! जानें हकीकत
पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता का मशहूर हावड़ा ब्रिज ( Howrah Bridge ) गुटखा और पाना मसाला खाने के चलते कमजोर हो रहा है। सुनने में यह बात थोड़ी अटपटी सी लगती है लेकिन है सौ टका सही। दरअसल गुटखे की पीक विशालकाय हावड़ा ब्रिज की सहेत पर भारी पड़ती जा रही है। आलम यह है कि तंबाकू थूकने की वजह से ब्रिज के पायों की मोटाई कम हो रही है। तंबाकू थूकने की वजह से ब्रिज कमजोर हो रहा है।
गुटखा की पीक के चलते मशहूर 70 साल पुराने पुल की सेहत खराब हो रही है। एक तरह से गुटखा-चबाने वाले हावड़ा ब्रिज पर हमला कर रहे हैं।
इससे पहले साल 2011 में हावड़ा ब्रिज पर एक रिपोर्ट आई थी, जिसमें यह बात सामने आई थी कि पान-मसाला और गुटखा थूकने के चलते ब्रिज के पायों की मोटाई कम हो रही है। इसके बाद कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट ने इसे बचाने की कवायद शुरू की थी। ट्रस्ट की ओर से इस बचाने के लिए स्टील के पायों को नीचे फाइबर ग्लास से ढंक दिया गया था। हावड़ा ब्रिज पर एक अनुमान के मुताबिक, हर रोज 1.2 लाख छोटे-बड़े वाहन और 5 लाख पैदल यात्री 70 साल पुराने इस पुल का इस्तेमाल करते हैं। इस दौरान पुल के पायों के निचले हिस्सों को सार्वजनिक पीकदान की तरह इस्तेमाल किए जाने के कारण बड़ा नुकसान हुआ है।
कोलकाता पोर्ट ट्रस्ट के ऊपर 70 साल पुराने पुल के रख-रखाव का जिम्मा है। गुटखे की पीक के कारण पुल के खंभों के तलों को हुए नुकसान के चलते उन्हें अब फाइबर ग्लास से ढक दिया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार, ट्रस्ट की माने तो पहले ही पुल के खंभों को काफी नुकसान हो चुका है। पीक थूकने के कारण हैंगरों की रक्षा करने वाले स्टील हुड की मोटाई पिछले 4 साल में अपने मूल आकार से 50 प्रतिशत कम हो गई है। ट्रस्ट के अनुसार, आधे चबाए गए पान के पत्ते, सुपारी और चूने में ऐसे रासायनिक पदार्थ मिले होते हैं, जो मजबूत स्टील तक को भी नुकसान पहुंचाते हैं।
हावड़ा ब्रिज एक कंटीलीवर पुल है, जो हुगली नदी के ऊपर सस्पेंडेड स्पैन के साथ है। साल 1943 में चालू हुए इस पुल का नाम ‘न्यू हावड़ा ब्रिज’ था क्योंकि हावड़ा और कोलकाता दो शहरों को जोड़ने वाले उसी स्थान पर पीपों के पुल के स्थान पर बना था। 14 जून 1965 को इसे रवींद्र सेतु का नया नाम दिया गया, जो कि बंगाल के महान कवि रवींद्र नाथ टैगोर के नाम पर रखा गया था। हालांकि इसे अभी तक हावड़ा ब्रिज के नाम से ही जाना जाता है।
