48 डिग्री तापमान में भी ठंडा रहता है दीमक का घर, आंधी-पानी का भी नहीं होता असर

बिहार के इकलौते टाइगर रिजर्व ‘वाल्मीकि’ में दीमकों के टीलों की भरमार है. रेतीली लाल मिट्टी से बने इन टीलों की लंबाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक देखी गई है. आश्चर्य की बात यह है कि हर टीलों में लाखों दीमक रहते हैं, जो समय समय पर अपने आस पास मौजूद पेड़ पौधों या लकड़ियों में मौजूद सेल्यूलोज को खाते हैं. वाइल्ड लाइफ एक्सपर्ट्स का मानना है कि दीमक प्रकृति के एक शानदार इंजीनियर हैं, जिनकी कारीगरी का लोहा वैज्ञानिकों ने भी माना है.

विशेषज्ञों के अनुसार, दीमको के ये टीले प्राकृतिक इंजीनियरिंग का अद्भुत उदाहरण हैं, जिन्हें वे अपनी लार, मल और मिट्टी के मिश्रण से तैयार करते हैं. वाल्मीकि टाइगर रिजर्व के मंगुराहा रेंज में कार्यरत नेचर गाइड सूरज बताते हैं कि रिजर्व के लगभग हर रेंज में इन टीलों की बड़ी संख्या देखने को मिलती है. इनकी ऊंचाई एक फीट से लेकर 12 फीट तक होती है और उनमें लाखों दीमक रहते हैं. एक बांबी को तैयार करने में 2 से 6 साल तक का समय लग जाता है.

वाइल्ड लाइफ विशेषज्ञ अभिषेक के मुताबिक, ये टीले बेहद मजबूत और टिकाऊ होते हैं. तेज बारिश, आंधी-तूफान या भीषण गर्मी का इन पर खास असर नहीं पड़ता. हैरानी की बात यह है कि बाहर का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस तक पहुंचने के बावजूद बांबी के अंदर का तापमान लगभग 24-25 डिग्री बना रहता है, जो प्राकृतिक एयर कंडीशनिंग का बेहतरीन उदाहरण है.

इनकी संरचना भी बेहद खास होती है. जितनी ऊंचाई जमीन के ऊपर होती है, उतनी ही गहराई जमीन के अंदर भी होती है. इस तरह की बनावट के कारण अंदर हवा का संतुलित प्रवाह बना रहता है, जिससे हर मौसम में अनुकूल वातावरण तैयार होता है.

दीमक कॉलोनी में रहते हैं, जहां रानी, राजा, सैनिक और श्रमिक की स्पष्ट भूमिका होती है. रानी दीमक एक दिन में 25 से 30 हजार तक अंडे दे सकती है. हालांकि, ये कीट घरों में नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन जंगल में इन्हें ‘प्राकृतिक इंजीनियर’ माना जाता है. भालू और पैंगोलिन जैसे जीव इनका शिकार भी करते हैं. सालों की मेहनत से तैयार ये टीले न केवल वैज्ञानिकों के लिए शोध का विषय हैं, बल्कि जंगल सफारी पर आने वाले पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र भी बनी हुई हैं.
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