छापा न पड़े इसलिए कंपनी ने राजनीतिक पार्टी को दिया 40 करोड़ का चंदा!

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वकील भूषण याचिकाकर्ता एनजीओ ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’ की ओर से पैरवी करते हुए इसे गंभीर मामला बताया है। इसके साथ ही इसकी अर्जेंट सुनवाई करने की भी मांग की है। इस पर सीजेआई रमण ने कहा कि यदि इस समय कोविड का मामला नहीं होता तो इसको तुरंत सुनता। हालांकि सीजेआई ने जल्द सुनवाई का भरोषा दिया है।

याचिका के द्वारा एनजीओ ने आरोप लगाया है कि 2017 से 2018 और 2018 से 2019 के बीच ऑडिट रिपोर्ट में राजनीतिक दलों ने जो चुनावी बॉन्ड के आकड़े घोषित किए हैं उसमें सत्तारूढ़ पार्टी को सबसे ज्यादा चुनावी बांड मिला है। एनजीओ ने बताया कि कुल चुनावी बांड का 60% सत्तारूढ़ मिला है।

एनजीओ ने लगाया ये आरोप
एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स एनजीओ ने कहा है कि राजनीतिक दलों को कॉर्पोरेट से असीमित चंदा मिल रहा है। इसके साथ ही विदेशी कंपनियों के लिए भी चंदे के द्वार खोल दिए गए हैं। वहीं इसके साथ ही इसका भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव पड़ने की भी बात कही। एनजीओ ने यह भी दावा किया है कि 2017 में चुनाव आयोग व रिजर्व बैंक ने चुनावी बांड जारी करने के लिए आपत्ति जताई थी।

कंपनियां फायदे के लिए देती हैं चंदा
एनजीओ ने दावा किया है कि चुनावी चंदा में मिलने वाला 99% चंदा 10 लाख से लेकर 1 करोड़ मूल्य का होता है। इसके द्वारा यह पता लगता है कि यह चंदा किसी व्यक्ति के द्वारा नहीं बल्कि बड़ी कंपनियों के द्वारा दिया जा रहा है। इसके लिए कंपनियों को सरकार से फायदा दिया जाता है।

चुनावी चंदे की कब हुई थी शुरुआत
सरकार के द्वारा 2 जनवरी 2018 से चुनावी चंदे की शुरुआत की गई थी। चुनावी चुनावी बांड को कोई भी व्यक्ति खरीद सकता है।