दुनिया की इकलौती जनजाति, जिसके पास नहीं है ‘समय’ का कोई ज्ञान
हम एक ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां हर सेकंड की कीमत है. घड़ी की सुइयां हमारे उठने, सोने और काम करने का फैसला करती हैं. लेकिन अमेजन के घने जंगलों में रहने वाली अमुंदावा जनजाति के लिए समय का कोई मोल नहीं है, क्योंकि उनकी डिक्शनरी में ‘समय’ शब्द ही नहीं है. आपको सुनकर ताज्जुब होगा, लेकिन बता दें कि ब्राजील के अमेजन वर्षावनों में रहने वाली इस जनजाति ने आधुनिक सभ्यता के सबसे बुनियादी आधार यानी ‘समय’ को ही नकार दिया है. यूनिवर्सिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ के शोधकर्ताओं ने जब इस जनजाति पर गहराई से रिसर्च की, तो वे यह जानकर दंग रह गए कि अमुंदावा भाषा में समय, सप्ताह, महीने या साल जैसे शब्दों के लिए कोई अनुवाद मौजूद ही नहीं है. इनके लिए बस सूरज का उगना और डूबना ही काफी है. ये लोग पूरी तरह से आज में जीते हैं और इन्हें कल की कोई परवाह नहीं होती.
इस जनजाति के बारे में सबसे मजेदार बात यह है कि इनके यहां किसी की उम्र का हिसाब नहीं रखा जाता. लैंग्वेज एंड कॉग्निशन में प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक, अगर आप किसी अमुंदावा से पूछेंगे कि वह कितने साल का है, तो उसके पास इसका कोई जवाब नहीं होगा. यहां उम्र को नंबरों में नहीं नापा जाता, बल्कि पहचान से जोड़ा जाता है. जब इस जनजाति का कोई बच्चा बड़ा होता है, तो उसका नाम बदल दिया जाता है यानी नाम बदलना ही इस बात का सबूत है कि वह व्यक्ति अब बड़ा हो गया है. यहां एक इंसान अपने पूरे जीवन में कई बार अपना नाम बदलता है. यह तरीका हमें सिखाता है कि बिना नंबरों के भी समाज को चलाया जा सकता है. वैज्ञानिकों ने जब इनकी भाषा को गहराई से समझा, तो पाया कि अमुंदावा लोग ‘समय बीत रहा है’ जैसी बात समझ ही नहीं पाते. उनके लिए वक्त कोई ऐसी चीज नहीं है, जिसे पकड़ा जा सके या जिसका हिसाब रखा जा सके. उन्हें घड़ी या कैलेंडर की जरूरत कभी महसूस ही नहीं हुई. साल 2011 में बीबीसी ने इस पर रिपोर्ट पब्लिश की थी.
जब पहली बार बाहरी दुनिया के लोगों ने इनसे संपर्क किया, तो वे इन्हें समझा ही नहीं पाए कि ‘बर्थडे’ या ‘उम्र’ क्या होती है. इनके यहां न तो कोई काम करने की डेडलाइन होती है और न ही कहीं पहुंचने की जल्दबाजी. शायद यही वजह है कि ये लोग आधुनिक दुनिया के लोगों से कहीं ज्यादा शांत और खुश रहते हैं. अब जब यह जनजाति धीरे-धीरे बाहरी दुनिया और तकनीक के संपर्क में आ रही है, तो उनके सामने अजीब मुश्किलें खड़ी हो रही हैं. जब सरकार इनके आईडी कार्ड या पासपोर्ट बनाने की कोशिश करती है, तो जन्म की तारीख लिखना नामुमकिन हो जाता है. इन्हें अब पुर्तगाली भाषा सिखाई जा रही है, ताकि ये दुनिया के साथ चल सकें. लेकिन इसके साथ ही डर यह भी है कि कहीं इनकी यह अनोखी और सुकून भरी संस्कृति खत्म न हो जाए. इनके पास घड़ी तो नहीं है, लेकिन ये कुदरत के इशारों को हमसे बेहतर समझते हैं.
