52 कोठी और 53 दरवाजों का अनसुलझा रहस्य
बिहार के नालंदा जिले में एक ऐसा खंडहर है, जो कभी मगध की सबसे रईस रियासत हुआ करता था. हम बात कर रहे हैं अस्थावां के 200 साल पुराने अमावा स्टेट राजमहल की. 22 एकड़ में फैले इस महल को लेकर कहा जाता है कि इसमें 52 कोठियां और 53 विशाल दरवाजे थे. आज भले ही यह ऐतिहासिक धरोहर वीरान पड़ी है, लेकिन इसकी जर्जर दीवारें अपने भीतर शाही शानो-शौकत और कई अनसुलझे रहस्य समेटे हुए हैं.
यह राजमहल अपने दौर की शानदार इंजीनियरिंग और आधुनिकता का बेमिसाल नमूना था. महल और कर्मचारियों के घरों को रोशन करने के लिए यहां बिहार का पहला निजी पावर हाउस बनाया गया था, जिसे कोलकाता से बिजली सप्लाई होती थी. इसके अलावा, महल परिसर के अंदर ही एक बड़ा संस्कृत कॉलेज भी चलता था, जहां देश के अलग-अलग राज्यों से सैकड़ों छात्र शिक्षा लेने आते थे.
इस रियासत के राजा हरिहर नारायण प्रसाद सिंह का साम्राज्य नालंदा से लेकर टेकारी तक फैला हुआ था. उस जमाने में भी इस स्टेट की सालाना कमाई करीब 50 हजार रुपये थी. राजा का रसूख इतना था कि देश के ज्यादातर बड़े तीर्थ स्थलों पर आम लोगों के ठहरने के लिए अमावा स्टेट की अपनी निजी धर्मशालाएं हुआ करती थीं.
महल का ढांचा बेहद सोच-समझकर तैयार किया गया था. इसमें जनता की फरियाद सुनने के लिए भव्य दरबार, मेहमानों के कमरे, अनाज के बड़े गोदाम, अस्तबल और विशाल रसोई मौजूद थी. सुरक्षा व्यवस्था इतनी पुख्ता थी कि पहरेदारों, नौकरों और रसोइयों के लिए महल के ठीक पास ही एक पूरी बस्ती बसाई गई थी. मकसद यह था कि कर्मचारी अपने परिवार की चिंता छोड़कर 24 घंटे पूरी ईमानदारी से महल की सुरक्षा कर सकें.
महल का नक्शा इस तरह से तैयार किया गया था कि कोठियों (कमरों) और दरवाजों की संख्या लगभग बराबर थी. इसकी जटिल संरचना के कारण कोई भी बाहरी दुश्मन या चोर यदि महल के अंदर बिना इजाजत घुस जाता था, तो वह कमरों और दरवाजों के चक्रव्यूह में उलझकर रह जाता था. उसे बाहर निकलने का रास्ता ही नहीं मिलता था.
यह राजपरिवार सिर्फ टैक्स नहीं वसूलता था, बल्कि कुएं-तालाब खुदवाने और मंदिर बनवाने जैसे सामाजिक काम भी करता था. लेकिन, देश आजाद होने के बाद जैसे ही जमींदारी उन्मूलन कानून लागू हुआ, अमावा स्टेट का सारा रुतबा खत्म हो गया. राजपरिवार के अधिकार छिन गए और जमीनें सरकार के पास चली गईं. देखरेख न होने से यह आलीशान महल धीरे-धीरे खंडहर में बदल गया. अब स्थानीय लोग इसे संवारकर पर्यटन स्थल बनाने की मांग कर रहे हैं.
