यूपी के इस गांव में होली पर महिलाओं से पिटने की होड़, सबसे ज्यादा मार खाने वाले की बल्ले-बल्ले!

उत्तर प्रदेश में होली की पहचान सिर्फ रंग-गुलाल तक सीमित नहीं है, बल्कि यहां हर इलाके की अपनी अलग परंपरा है. ब्रज क्षेत्र की इसी सांस्कृतिक विरासत में एक अनोखा रंग जुड़ता है फिरोजाबाद जिले के टूंडला क्षेत्र के चुल्हावली गांव से, जहां सदियों पुरानी “पैनामार होली” आज भी पूरे उत्साह से मनाई जाती है.यह परंपरा होलिका दहन के अगले दिन, यानी परेवा को आयोजित होती है. गांव की महिलाएं नई साड़ियां पहनकर हाथों में ‘पैना’ लेकर मैदान में उतरती हैं. वहीं पुरुष भी नए कपड़े पहनकर इस अनोखे उत्सव में भाग लेते हैं और शाम होते-होते गांव का चौक हंसी-मजाक और शोर-गुल से भर जाता है और फिर शुरू होती है हंसी मजाक के साथ पिटाई वाली होली.

पैना लकड़ी की छड़ी में चमड़े की पट्टी बांधकर बनाया जाने वाला पारंपरिक औजार है, जिसका उपयोग पुराने समय में बैलों को हांकने के लिए किया जाता था. लेकिन फिरोजाबाद के इस गांव में बैलों के हांकने का यह औजार होली का खिलौना बन जाता है. महिलाएं पैना से पुरुषों को प्रतीकात्मक रूप से मारती हैं और पुरुष बिना नाराज हुए मुस्कुराते हुए मार सहते हैं. दिलचस्प बात यह है कि यहां इसे प्रतियोगिता का रूप भी दिया जाता है. सबसे ज्यादा पैना सहने वाले पुरुष और सबसे ज्यादा ‘पिटाई’ करने वाली महिला को बाद में सम्मानित किया जाता है. यही वजह है कि आसपास के गांवों से भी लोग इस परंपरा को देखने उमड़ पड़ते हैं

स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, यह परंपरा ब्रज की होली संस्कृति से जुड़ी है, जिसकी झलक मथुरा, वृंदावन, बरसाना और बलदेव की प्रसिद्ध लट्ठमार और कोड़ामार होली में भी दिखाई देती है. ब्रज में रंगभरनी एकादशी से ही होली का उत्सव शुरू हो जाता है और मंदिरों में ठाकुरजी-राधारानी की विशेष होली खेली जाती है.

चुल्हावली की पैनामार होली केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि रिश्तों की मिठास, हास्य और सामूहिक उल्लास का प्रतीक है. यहां मार में भी प्यार है और परंपरा में भी अपनापन- शायद यही वजह है कि सैकड़ों साल बाद भी यह अनोखी होली गांव की पहचान बनी हुई है.