दुनिया का वो इकलौता गांव, जहां 60 साल से पैदा हो रहे हैं सिर्फ ‘बौने’
दुनियाभर में कई ऐसी जगहें मौजूद हैं, जिनका रहस्य आज तक अनसुलझा है. इनमें से कोई जगह समुद्र के बीच है, जहां उड़ती हुई जहाज भी गायब हो जाती है, तो कोई जगह धरती पर है, जहां कई बार एलियंस के उड़न तश्तरी को देखे जाने का दावा किया जाता रहा है. इनमें से दुनिया के नक्शे पर कुछ ऐसी विचित्र जगहें भी मौजूद हैं, जहां का भूगोल और वहां रहने वाले लोगों का जीवन किसी काल्पनिक डरावनी फिल्म की पटकथा जैसा प्रतीत होता है. इन्ही में से एक है चीन के शिचुआन प्रांत का एक सुदूर और छोटा सा गांव ‘यांग्सी’ (Yangsi), जिसे आज पूरी दुनिया ‘सबसे शापित गांव’ या ‘बौनों का गांव’ के नाम से जानती है. सुनकर हैरानी होगी, लेकिन बता दें कि यहां पिछले छह दशकों से कुदरत का एक ऐसा खौफनाक करिश्मा जारी है, जिसने शोधकर्ताओं की रातों की नींद उड़ा दी है.
इस गांव की सबसे अजीब बात यह है कि यहां रहने वाली 50 प्रतिशत से अधिक आबादी का कद मात्र 2 से 3 फीट के बीच सिमट कर रह गया है. रिपोर्ट्स के अनुसार, साल 1951 के बाद से इस गांव में बच्चों के शारीरिक विकास पर जैसे किसी ने रोक लगा दिया हो. जो बच्चे जन्म के समय पूरी तरह सामान्य, स्वस्थ और खिलखिलाते हुए पैदा होते हैं, वे जैसे ही 5 से 7 साल की उम्र के पड़ाव पर पहुंचते हैं, उनकी लंबाई बढ़ना अचानक बंद हो जाती है. हाल ही में एक डॉक्यूमेंट्री रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स ने दावा किया है कि उन्होंने यहां की मिट्टी, पानी, हवा और यहां तक कि स्थानीय स्तर पर उगाए जाने वाले अनाज के हर एक कण की दोबारा गहन जांच की है, लेकिन कद छोटा रह जाने का कोई भी ठोस, तार्किक या चिकित्सकीय कारण सामने नहीं आ सका.
कुछ स्थानीय बुजुर्ग और ग्रामीण इसे दशकों पुराना एक खौफनाक ‘श्राप’ मानते हैं. लोक कथाओं के अनुसार, पूर्वजों को गलत नक्षत्रों में दफनाने या किसी दिव्य शक्ति के क्रोध के कारण गांव पर यह विपत्ति आई है. वहीं, दूसरी ओर कुछ इतिहासकार इसे दशकों पहले युद्ध के दौरान जापान द्वारा छोड़ी गई किसी जहरीली गैस या रासायनिक प्रयोग का दुष्प्रभाव बताते हैं, जिसने शायद यहां के लोगों के डीएनए के साथ छेड़छाड़ कर दी हो. 1950 के दशक के आसपास इस इलाके में एक रहस्यमयी बीमारी फैली थी, जिसके बाद से नई पीढ़ी का कद बढ़ना लगभग रुक गया. विशेषज्ञों ने इस सामूहिक बौनेपन को ‘स्टंटेड ग्रोथ’ का नाम तो दिया, लेकिन यह रहस्य आज भी कायम है कि यह समस्या सिर्फ इसी गांव की सरहदों के भीतर ही क्यों कैद है. वैज्ञानिकों ने हाल ही में जेनेटिक म्यूटेशन के आधुनिक पहलुओं से जांच शुरू की है, लेकिन 60 साल पुरानी इस गुत्थी को वो भी अब तक सुलझा नहीं पाए.
