प. बंगाल राज्यपाल को बम ब्लास्ट की धमकी का ई-मेल, अधिकारी बोले-आरोपी ने अपना मोबाइल नंबर भी लिखा, गिरफ्तार
पश्चिम बंगाल के राज्यपाल सीवी आनंद बोस को गुरुवार देर रात ई-मेल के जरिए जान से मारने की धमकी दी गई। लोक भवन के सीनियर अफसर ने धमकी की पुष्टि की है। अधिकारी के मुताबिक ई-मेल में राज्यपाल को बम से उड़ा देने की धमकी दी गई है। धमकी भेजने वाले ने ई-मेल में अपना मोबाइल नंबर भी लिखा है। पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार कर लिया है। अधिकारी ने कहा- हमने डीजीपी को जानकारी दी है। आरोपी की तत्काल गिरफ्तारी के निर्देश दिए गए हैं। सीएम ममता बनर्जी और गृह मंत्रालय को भी घटना की जानकारी दी गई है। राज्य पुलिस और सीआरपीएफ के 60-70 जवान राज्यपाल बोस की सुरक्षा में तैनात हैं। राज्यपाल को Z+ सिक्योरिटी मिली है।
राज्यपाल बोस को धमकी की घटना उस वक्त हुई है, जब राज्य में सियासी तूफान उठा हुआ है। 8 जनवरी को ED (प्रवर्तन निदेशालय) ने TMC के सोशल मीडिया हेड के ठिकानों पर रेड मारी थी। CM ममता ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया। इस पर राज्यपाल ने कहा है कि एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान में सहयोग करे। किसी लोक सेवक को उसके कर्तव्य से रोकना दंडनीय अपराध है।
भाजपा IT सेल के हेड अमित मालवीय ने कहा- ममता बनर्जी के राज में आपका स्वागत है, जहां गवर्नर भी सुरक्षित नहीं हैं। पश्चिम बंगाल में कानून-व्यवस्था पूरी तरह से चरमरा गई है। गृह मंत्री, ममता बनर्जी, कोयला तस्करी और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपी एक प्राइवेट फर्म को बचाने के लिए ED से सबूत वाली फाइलें छीनने में व्यस्त हैं। ममता बनर्जी एक पूरी तरह से नाकामयाब नेता हैं। राज्यपाल बोस ने राज्य के कई विश्वविद्यालयों में वाइस चांसलर (VC) नियुक्त किए, जिस पर राज्य सरकार ने आपत्ति जताई। सरकार का आरोप था कि नियुक्तियां राज्य की सलाह के बिना हुईं। राज्यपाल ने कहा कि कानून के तहत यह उनका अधिकार है। मामला अदालत तक पहुंचा और उच्च शिक्षा व्यवस्था प्रभावित हुई। राज्य सरकार ने आरोप लगाया कि राज्यपाल कई विधेयकों पर मंजूरी में देरी कर रहे हैं। ममता बनर्जी ने इसे ‘लोकतांत्रिक प्रक्रिया में बाधा’ बताया था। राज्यपाल का पक्ष था कि विधेयकों की संवैधानिक जांच जरूरी है। इससे सरकार-राज्यपाल संबंध और तनावपूर्ण हुए।
राज्यपाल ने मनरेगा सहित केंद्रीय योजनाओं में कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए। राज्य सरकार ने इसे राजनीति से प्रेरित बताया। दोनों पक्षों के बयानों से केंद्र-राज्य संबंधों पर भी असर पड़ा। राज्यपाल के जिलों के दौरे और जनता से सीधे संवाद पर सरकार ने आपत्ति जताई। सरकार ने कहा कि यह समानांतर प्रशासन जैसा है। राज्यपाल ने इसे जनता से जुड़ने का संवैधानिक दायित्व बताया था।
