प्यासी मरने वाली है दुनिया? खतरे में 75 करोड़ लोग

अगर एक दिन आपके शहर में नल से पानी आना अचानक बंद हो जाए तो वजह कोई खराब पाइप नहीं होगी. सूख चुके जलाशय होंगे. यह चौंकाने वाला होगा. वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसा दिन अब दूर नहीं है. जर्नल Nature Communications में छपी स्टडी के मुताबिक डे जीरो ड्रॉट की स्थिति कई इलाकों में सामने आ सकती है. वैज्ञानिकों के मुताबिक डे जीरो ड्रॉट तब होता है जब कई साल तक सूखा पड़ता है. तापमान बढ़ता है, नदियों में पानी बहुत कम हो जाता है. दूसरी तरफ पानी की मांग लगातार बढ़ती रहती है. जब इन सबका असर एक साथ पड़ता है और बड़े-बड़े जलाशय खाली होने लगते हैं. तब हालात बेहद गंभीर हो जाते हैं. रिसर्च में कई क्लाइमेट मॉडल का इस्तेमाल किया गया है. इनमें पाया गया कि अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ऐसे ही चलता रहा तो साल 2100 तक सूखे से प्रभावित करीब तीन-चौथाई इलाकों में ऐसा जल संकट आ सकता है जैसा पहले कभी नहीं देखा गया होगा.

साल 2018 में दक्षिण अफ्रीका का केप टाउन शहर कुछ महीनों के लिए नलों का पानी बंद करने के बेहद करीब पहुंच गया था. तीन साल तक कम बारिश होने से वहां के जलाशय लगभग सूख गए थे. भारत का चेन्नई और अमेरिका का लॉस एंजिलिस भी ऐसे हालात झेल चुके हैं. यहां पर लोगों को पानी बचाने के लिए सख्त पाबंदियों का सामना करना पड़ा था. स्टडी के मुताबिक सदी के अंत तक भूमध्यसागर के आसपास के इलाके, दक्षिणी अफ्रीका, उत्तरी अमेरिका के कुछ हिस्से, भारत, उत्तरी चीन और दक्षिणी ऑस्ट्रेलिया में पानी की भारी किल्लत बनी रह सकती है. कई जगहों पर 2030 के तक ही डे जीरो जैसी स्थिति शुरू हो सकती है. ऐसा अनुमान है कि दुनिया के करीब 14 फीसदी बड़े जलाशय अपने सबसे खराब दौर में लगभग खाली होने की कगार पर पहुंच सकते हैं. ऐसे में पीने का पानी, खेती, बिजली और उद्योग सब पर असर पड़ने वाला है.

जब पहली बार डे जीरो ड्रॉट जैसी स्थिति आएगी तब करीब 75 करोड़ लोग इसकी चपेट में आ सकते हैं. इनमें से लगभग 46 करोड़ लोग शहरों में रहने वाले होंगे. भूमध्यसागर वाला इलाका सबसे ज्यादा खतरे में है. जहां करोड़ों शहरी और ग्रामीण लोग पानी की कमी झेल सकते हैं. हालांकि अफ्रीका और एशिया के कुछ ग्रामीण इलाकों में किसानों पर इसका असर पहले दिख सकता है. इसके पीछे का कारण ये है कि उनकी खेती बारिश और नदियों पर ज्यादा निर्भर है. चिंता की बात यह है कि कई इलाकों में सूखे का समय इतना लंबा होगा कि अगला सूखा आने से पहले हालात सामान्य होने का मौका ही नहीं मिलेगा. जलाशय लगातार खाली रहेंगे. थोड़ी बारिश भी हालात सुधार नहीं पाएगी.

वैज्ञानिकों का कहना है कि डे जीरो ड्रॉट का सीधा संबंध ग्लोबल वार्मिंग से है. रिसर्च में पाया गया कि 60 फीसदी से ज्यादा इलाकों में यह संकट तब सामने आता है जब धरती का तापमान औद्योगिक दौर से 1 से 2.5 डिग्री सेल्सियस ज्यादा हो जाता है. 1.5 डिग्री पर ही करोड़ों लोग पानी के बड़े संकट का सामना कर सकते हैं.

वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अभी भी उत्सर्जन कम किया जाए तो लंबे समय के खतरे को घटाया जा सकता है. इसके साथ ही पानी के बेहतर इस्तेमाल बारिश का पानी जमा करने, गंदे पानी को दोबारा इस्तेमाल करने और जलाशयों का सही प्रबंधन करने की जरूरत है. इससे चीजों को ठीक किया जा सकता है.