आर्कटिक महासागर के 4 किमी नीचे मिली ‘दूसरी दुनिया’, वैज्ञानिकों ने गहराई में खोजा अनोखा इकोसिस्टम

वैज्ञानिकों ने आर्कटिक महासागर की गहराई में एक ऐसी छिपी दुनिया की खोजी है जो समुद्र के नीचे जीवन और जलवायु परिवर्तन को समझने का हमारा तरीका बदल सकता है. समुद्र की सतह से बहुत नीचे जहां सूरज की रोशनी नहीं पहुंचती और पानी जमा देने वाला ठंडा रहता है वहां एक अनोखा इकोसिस्टम मिला है. यह खोज दुनिया भर के जलवायु विज्ञान को समझने के लिए बहुत महत्वपूर्ण है. इससे पता चलेगा कि समुद्र के नीचे कार्बन और गैसें किस तरह काम करती हैं. जूलियाना पैनीरी और जोनाथन टी. कॉपले के नेतृत्व में वैज्ञानिकों की एक टीम ने इस अनोखी दुनिया का पता लगाया है. वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में मीथेन हाइड्रेट की टीले मिले हैं जिन्हें फ्रेया टीले नाम दिया गया है. ये टीले असल में मीथेन गैस, दूसरी गैसों के कच्चे तेल से बनी बर्फ जैसी जमी हुई संरचनाएं हैं. ये टीले आर्कटिक महासागर में ग्रीनलैंड महासागर में सतह से 4 किमी नीचे है.

समुद्र की इतनी गहराई में सूरज की रोशनी बिल्कुल नहीं पहुंचती. यहां रहने वाले पेड़-पौधों की तरह धूप से नहीं बल्कि रसायनों से मिलने वाली ऊर्जा के सहारे जिंदा रहते हैं. वैज्ञानिकों ने गहराई में जाने के लिए ऑरोरा नाम की एक रोबोटिक मशीन का इस्तेमाल किया. समुद्र के तल पर मीथेन और तेल के जमे हुए टीले दिखे जो किसी शंकु की तरह दिखते थे. कुछ टीले तो 6 मीटर तक चौड़े थे और उनसे गैस निकल रही थी.

वैज्ञानिकों ने पहली बार समुद्र की इतनी ज्यादा गहराई पर गैस का रिवास मिला है. इससे पहले ऐसी चीजें केवल 2,000 मीटर तक की गहराई पर देखी थीं लेकिन यह खोज उससे कहीं ज्यादा नीचे हुई है. समुद्र की गहराई को मापने वाले सोनार ने वहां एक अद्भुत नजारा देखा. समुद्र के तल से मीथेन गैस के विशाल गुबार या फव्वारे निकल रहे हैं.

वैज्ञानिकों को यहां जीवों की 20 से ज्यादा प्रजातियां मिली हैं. इनमें लंबी नली जैसे दिखने वाले कीड़े, घोंघे और झींगे जैसे कई जीव शामिल हैं. ये सभी जीव बिना किसी रोशनी और जमा देवे वाली ठंड से मजे से रह रहे हैं. जहां हम और आप खाने के लिए सूरज की रोशनी पर निर्भर पौधों का सहारा लेते हैं जिसे कीमोसिंथेसिस कहते हैं. इन टीलों से निकलने वाली मुख्य गैस मीथेन है और इथेन और प्रोपेन जैसी गैसें भी मिली हैं. इसका मतलब है कि ये गैसें धरती की ऊपरी सतह से नहीं बल्कि बहुत गहराई से निकल रही हैं.